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________________ अनुकम्पाधिकारः । २१७ किन्तु पाप है । जो कसाई प्रति दिन ५०० बकरा मारता है उसको कोई मारने लगे तो साधु उस मारनेवालेकी हिंसा छुडानेके लिये धर्मका उपदेश करता है कसाईकी प्राणरक्षा करनेके लिये धर्मोपदेश नहीं करता क्योंकि यदि कसाई बचेगा तो वह फिर ५०० बकरों को रोज मारेगा उसी तरह दूसरे असंयति यदि बचें तो वे भी प्रतिदिन एकेन्द्रियादि जीवों का विनाश करेंगे अतः साधु हिंसाका पाप छुडानेके लिये हिंसकको उपदेश करता है हिंसकके हाथ से असंयतिकी प्राणरक्षा करनेके लिये नहीं । इसका क्या समाधान ? ( प्ररूपक ) साधु किसी की भी हिंसा होना पसन्द नहीं करता वह सबकी रक्षा करना चाहता है वह जैसे कसाईकी हिंसा करनेवालेको धर्मोपदेश देकर कसाईकी प्राणरक्षा करना चाहता है उसी तरह कसाईको धर्मोपदेश देकर उससे प्रति दिन मारे जाने वाले बकरों की भी प्राणरक्षा ही चाहता है वह यह नहीं चाहता कि यह कसाई जीवित रह कर प्रतिदिन arinी हिंसा करे किन्तु यह कसाई तथा इससे मारे जाने वाले प्राणी, सभी आर्तरौद्र ध्यान और मरण भयसे बचें यही कामना साधु करता है और इसके साथ साथ हिंसाके पापसे हिंसकको भी भुक्त करना चाहता है इसी भाव से प्रेरित होकर साधु धर्मोपदेश देता है और धर्मोपदेश देकर मरनेवाले प्राणीको आर्त रौद्र ध्यानसे और मारने वालेको हिंसा के पाप से मुक्त करता है । वह मरने वाले प्राणीके मार्त रौद्र ध्यान तथा मरण महा भयकी निवृत्तिका ही कामुक है उसके असंयम सेवन आदि बुराइयोंका इच्छुक नहीं है अतः असंयति जीव की प्राणरक्षा के निमित्त धर्मोपदेश देनेसे उस असंयतिसे सेवन किये जाने वाले असंयम आदि बुराइयोंका अनुमोदन साधुको नहीं लगता । यदि असंयम की इच्छा न रखने पर भी असंयतिको बचा देने मात्र से साधु को असंयम का अनुमोदन लगे तो हिंसकको अहिंसाका उपदेश देनेसे भी असंयमका अनुमोदन लगना चाहिये क्योंकि अहिंसाका उपदेश सुन कर हिंसक यदि असंयतिको न मारे तो वह असंयति जीवित रह कर असंयमका सेवन कर सकता है । इस प्रकार जिसने अहिंसाका उपदेशके द्वारा हिंसकसे असंयतिकी हिंसा रोक दी है वह उस असंयतिके असंयम सेवनका अनुमोदक क्यों नहीं होगा ? यदि उक्त अहिंसाका उपदेशक, हिंसा छुडाने मात्र की भावनासे उपदेश देता है हिंसकके हाथसे मारे जाने वाले प्राणी की प्राणरक्षा तथा उससे किए जाने वाले असंयम सेवनकी इच्छा से नहीं इस कारण उसे असंयम सेवनका अनुमोदन नहीं लगता तो उसी तरह जो प्राणियोंकी प्राणरक्षा और उनके आर्त रौद्र ध्यानको निवृत्त करने मात्रकी इच्छासे प्राणियोंकी प्राणरक्षा करता है २५ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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