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दानाधिकारः।
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दृष्टान्त देकर दीन हीन दुःखी जीवको अनुकम्पा दान देनेमें एकान्त पाप बसलाना अज्ञानका परिणाम समझना चाहिये ।
(बोल २९ वां समाप्त) (प्रेरक)
गृहस्थको दान देनेसे यदि पुण्य होता है तो साधु भी उत्सर्ग मार्ग में गृहस्थको दान क्यों नहीं देता तथा निशीथ सूत्र में गृहस्थको दान देने वाले साधुको प्रायश्चित्त आना क्यों कहा गया है ?
इसका उत्तर दीजिये ? (प्ररूपक)
गृहस्थ तथा अन्य तीथी के ऊपर अनुकम्पा लाकर दान देनेसे एकान्त पाप होना जान कर निशीथ सूत्रमें साधुको गृहस्थ दानका निषेध नहीं किया है, किन्तु, ज्ञान, दर्शन मौर चारित्र रूप विशाल धर्मको छोड़ कर अनुकम्पा दान रूप एक साधारण पुण्यका लोभ करना साधु के लिये वर्जित किया गया है । अनुकम्पा दानका पुण्य लाभ तो गृहस्थावस्थामें भी किया जा सकता है परन्तु ज्ञान दर्शन और चारित्र रूप धर्मका लाभ गृहस्थावस्थामें पूर्णतया नहीं हो सकता इसीलिये गृहस्थावस्थाको छोड़कर दीक्षा ग्रहण की जाती है। दीक्षा लेने का उद्देश्य ज्ञान दर्शन और चारित्र की उन्नति करना है उस मुख्य उद्देश्यको छोड़ कर अनुकम्पा दान आदि साधारण पुण्यके कार्यमें प्रवृत्त होना साधुके लिये अनुचित और उसकी अवनतिका कारण है। जैसे कोई रत्नका व्यापारी रत्नके व्यापारको छोड़ कर पैसेके व्यापारमें प्रवृत्त हो जाय तो उसके लिये यह उचित नहीं कहा जा सकता यद्यपि उसको पैसेके व्यापारमें केवल घाटा ही नहीं लाभ भी होता है तथापि रनके व्यापारमें होने वाले लाभकी अपेक्षासे वह लाभ बहुत ही निकृष्ट है उसी तरह जो साधु शान दर्शन और चारित्रका व्यापार छोड़ कर अनुकम्पा दान जैसा एक साधारण पुण्यके व्यापारमें प्रवृत्त होता है वह महान लाभको छोड़ कर एक साधारण लाभका कार्य करता है इसी लिये शास्त्रमें यह कार्य साधुको अनुचित कहा गया है, यह नहीं कि अनुकम्पा दानसे एकान्त पाप होना जान कर गृहस्थ दानका निषेध किया गया हो।
यदि कोई कहे कि-गृहस्थको दान देनेसे साधुके ज्ञान दर्शन और चारित्रकी उन्नतिमें क्या बाधा होती है ? तो उसे कहना चाहिये कि साधुको अपने शरीरके निर्वाहसे अधिक भोजन लेना कल्पता नहीं है ऐसी दशामें यदि साधु अन्य तीथीं और
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