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________________ सद्धर्ममण्डनम् । मूल पाठमें है और न उसकी टीकामें ही है इसलिए आदि शब्दसे सभी असंयतियोंका ग्रहण बतलाना भी इनका मूर्ख जनताको धोखा देना है । साधुके सिवाय दूसरेको पोषग करसेने यदि पन्द्रहवें कर्मादानका पाप लगे तो कोई भी व्यापारी श्रावक, निरतिचार अपने बारह व्रतका पालन नहीं कर सकता क्योंकि व्यापारी श्रावकको अपने व्यापार की सिद्धिके लिए गाय, भैंस, ऊंट घोड़े नौकर आदि असंयति प्राणियोंके पोषगकी आवश्यकता होती है इनका पालन किये बिना व्यापार सम्बन्धी कार्य नहीं चल सकता कदाचित् कोई इनके बिना भी अपना काम चला लेवे तो भी उसे अपने माता पिता पुत्र पौत्र आदि परिवार वर्गका पालन करना ही पड़ता है और इनके पालन करनेसे भी तेरह पन्थियोंके मतमें अतिचार लग सकता है क्योंकि ये लोग भी असंयति हैं और व्यापारमें सहायता देते हैं इनका पोषण भी व्यापारार्थ कहा जा सकता है इसलिये अपने माता पिता पुत्र पौत्र आदिका पालन कर ने वाला श्रावक भी तेरह पन्थियोंके हिसाबसे कर्मादानके पापसे नहीं बच सकता है किन्तु व्यापारी श्रावक मात्र ही कर्मादानके पापसे युक्त हो जाते हैं परन्तु यह बिलकुल मिथ्या है व्यापारी श्रावक अपने बारह व्रतका निरतिचार भी पालन कर सकता है वह जो गाय भैंस घोड़े ऊंट नौकर चाकर आदिका व्यापारार्थ पालन करता है इससे उसके बारह व्रतमें कोई अतिचार नहीं आता है क्योंकि पन्द्रहवें कर्मादानका नाम "असंयति पोषगता" है ही नहीं। जो वेश्या आदिका पोषण करके उनसे भाडेपर व्यभिचार कराने रूप व्यापार करता है वह पुरुष पन्द्रहवें कर्मादानका सेवन करता है क्योंकि १५ वें कर्मादानका नाम "असतीजन पोषणता” है। अतः साधुसे भिन्न प्राणीके पोषण करनेसे कर्मादानका सेवन बतलाना मिथ्या है। _ अपने आश्रित प्राणीको आहार न देनेसे श्रावकके प्रथम व्रतमें अतिचार आता है इसलिए अपने पहले व्रतको निरतिचार पालनार्थ श्रावकको अपने आश्रित प्राणीके लिये अवश्य आहार देना पड़ता है परन्तु जीतमलजीके हिसाबसे इस कार्य से श्रावकके ७ वें व्रतमें अतिचार आता है क्योंकि साधुके सिवाय दूसरेको आहार देना वे कर्मादानका सेवन करना बतलाते हैं ऐसी दशामें बारह व्रतधारी श्रावक अपने आश्रित प्राणीको भात पानी देकर अपने व्रतका अतिचार टाले या न देकर सातवें व्रतका अतिचार टाले ? यदि वह देवे तो कर्मादानका सेवन हो जाय और न देवे तो उसके पहले व्रतमें अतिचार आवे इसलिए वह देकर और न देकर किसी भी हालतमें अपने व्रतका निरतिचार पालन नहीं कर सकता। अतः साधुके सिवाय दूसरेके पालन करनेसे १५ वें कर्मादानका पाप बतलाना जीतमलजीका अज्ञान है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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