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________________ दानाधिकारः। १२१ आचार व्यवहारको व्यवस्थाको कुल धर्म कहते हैं, अथवा कुल नाम जैनोंके चान्द्रादिक गच्छका है उसकी समाचारीको कुल धर्म कहते हैं। मल्लयुद्ध आदिसे अपनी जीविका चलाने वाले मनुष्योंके आचार व्यवहारकी व्यवस्थाका नाम गण धर्म है। अथवा जैनोंके कुल समुदाय कोटिकादिका नाम गण है उसके समाचारको गगधर्म कहते हैं । सभा आदिके नियम और उपनियमोंको सङ्घधर्म कहते हैं अथवा जैनोंके साधु साध्वी श्रावक और श्राविकाओंके समूहका नाम सङ्घ है उसके धर्मको सङ्घधर्म कहते हैं । दुर्गतिमें पड़ते हुए जीवोंको बचाने वाले आचाराङ्गादि बारह अङ्गोंका नाम श्रुत धर्म है। कर्म समूहको विनाश करनेवाले धर्मको चारित्र धर्म कहते हैं । अस्ति नाम प्रदेशोंका है उनकी राशिको अस्तिकाय धर्म कहते हैं यह जीवोंको गति और पर्यायमें धारण करता है इसलिये इसे धर्म कहते हैं इसी तरह पञ्चास्ति कायका धर्म समझना चाहिए । यह ऊपर लिखी हुई टीकाका अर्थ है। . यहां मूलपाठ और टीकामें पहले पहल ग्राम धर्म कहा गया है यह ग्राम धर्म, प्रामस्थ जनताको चोरी जारी हिंसा झूठ आदि बुराइयोंसे हटा कर सत्पथमें प्रवृत्त करता है ग्रामवासियोंकी स्थिति रक्षा और उन्नति इसी ग्राम धर्म पर अवलम्बित है। जिस ग्राममें ग्रामधर्मका पालन नहीं होता उसका शीघ्र ही अन्त हो जाता है इसलिये ग्रामधर्म को जो एकान्त पाप कहता है उसे प्रथम श्रेणिका मूर्ख समझना चाहिये। जिससे चोरी जारी झूठ हिंसा आदि पाप कर्म रुकें और जनता सदाचारिणी बने वह एकान्त पाप कैसे हो सकता है ? इसी तरह नगरधर्म और राष्ट्रधर्म भी नगर तथा राष्ट्रमें रहने वाली जनताको चोरी जारी हिंसा आदि पाप कर्मोंसे रोक कर सुमार्गमें प्रवृत्त करते हैं। इनके विना नार और राष्ट्र सुव्यवस्थित नहीं रह सकते अतः इन धर्मोको एकांत पापमें कहना अज्ञान का परिणाम है । जिससे चोरी जारी और हिंसा आदि एकान्त पापके कार्य रोक दिये जाते हैं वह एकान्त पाप कैसे हो सकता है यह बुद्धिमानोंको स्वयं सोच लेना चाहिये। यदि कोई कहे कि “ये ग्रामधर्म आदि जनताके हितसाधक अवश्य हैं परन्तु मोक्ष के सहायक नहीं हैं इसलिये ये लौकिक धर्म हैं लोहोत्तरधर्म नहीं हैं और लोकोत्तरधर्मसे भिन्न सभी धर्म एकान्त पाप हैं तो यह मिथ्या है। ये प्रामधर्मादि मोक्षके भी सहायक हैं क्योंकि श्रुत और चारित्रधर्मके पालनसे मोक्ष होता है और उनका पालन करनेवाले पुरुष ग्राम नगर तथा राष्ट्रमें ही रहते हैं वे अपने श्रुत और चारित्र धर्मका पालन तभी कर सकते हैं जब ग्राम नगर और राष्ट्रोंमें प्रामधर्म नगरधर्म और राष्ट्रधर्मका पालन होता Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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