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________________ सद्धर्ममण्डनम् । तपस्यासे संसारका अन्त न होकर अनन्त कालतक गर्भवास भोगना क्यों पड़ता ? जो किया वीतरागसे कही हुई है उसका आचरण करनेवाला पुरुष कदापि अनन्त संसारी नहीं होता। यदि वीतराग भाषित क्रियाके आचरण करनेपर भी संसारका अन्त न हो तो फिर मोक्षार्थियोंके लिए कोई आश्रय ही नहीं रहता । अतः मिथ्यादृष्टिको वीतरागकी आज्ञा में होने बाली क्रियाका आराधक मानना और उस क्रिया के करनेपर भी अनन्त कालतक गर्भवास की प्राप्ति कहना अज्ञानका परिणाम है । ५० इस गाथामें मिथ्यादृष्टिकी तपस्याको गर्भवासका कारण बतला कर साफ साफ उसे आज्ञा बाहर और मोक्षमार्ग में न होना बतलाया है । अतएव इस गाथासे आगे की गाथाका इससे सम्बन्ध मिलाते हुए टीकाकारने लिखा है कि " यतो मिथ्यादृष्टयुपविष्ट तपसाऽपि न दुर्गति मार्ग निरोधोऽतो मदुक्त एव मार्गे स्थेयम् इत्येतत्संदर्भमुपदेशं दातु माह " इसका अर्थ यह है कि “मिध्यादृष्टियोंसे उपदेश की हुई तपस्या दुर्गतिके मार्गको नहीं रोक सकती इस लिए मेरे बताए हुए मार्ग ( वीतराग भाषित धर्म ) में ही रहना चाहिए यह उपदेश देनेके लिए अगली गाथा कहीं गई है। यह इस टीकाका अर्थ है । इसमें मिथ्यादृष्टि अज्ञानियोंकी तपस्याको स्पष्ट रूपसे मिथ्यादृष्टियोंसे उपदेश की हुई बतलाया है वीतरागसे कही हुई नही कहा है इसलिए मिथ्यादृष्टिकी क्रिया स्पष्ट आज्ञा बाहर सिद्ध होती है । यदि यह मोक्ष मार्गमें होती तो उससे दुर्गतिका निरोध क्यों नहीं होता ? तथा उसे छोड़ कर फिर वीतराग भाषित धर्ममें आनेकी भी क्या आवश्यकता थी ? जबकि यह भी वीतराग भाषित ही होती तो इसे छोड़ कर वीतराग भाषित धर्म में नेके लिए इसकी आगेकी गाथामें क्यों कहा जाता ? अतः मिथ्यादृष्टिकी तपस्याका जिनोक्त धर्म और मोक्षमार्ग में न होना स्पष्ट सिद्ध होता है । तथापि इस गाथाका अन्यथा तात्पर्य बतला कर भ्रमविध्वंसनकारने यह भ्रम फैलाया है कि 'मिथ्यादृष्टिकी तपस्या तो वीतरागकी आज्ञामें ही है पर मिथ्यादृष्टि मायाकरता है इसलिए उसको अनन्त कालतक गर्भवास भोगना यहां कहा है " यह इनका कथन नितान्त इस गाथासे विरुद्ध है । इस गाथा में मिथ्यादृष्टिकी तपस्याको मोक्षार्थी पुरुषोंसे सर्वथा त्यागने योग्य बतछाने के लिए उससे दुर्गति मार्गका निरोध न होना कहा है । यदि वह तपस्या मोक्ष मार्ग में होती तो उसे छोड़नेके लिये आग्रह करनेकी क्या आवश्यकता थी । तथा "जे इह मायाइ मिज्जइ " यह जो इस गाथामें वाक्य आया है उसका भी अर्थ यह नहीं है कि "ओ पुरुष माया करता है।" इसका अर्थ टीकाकारने इस प्रकार किया है कि – “यः तीर्थकः मायादिना मीयते उपलक्षणार्थत्वात्कषायैर्युक्त इत्येवं परिच्छेिद्यते " इसका अर्थ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034599
Book TitleSaddharm Mandanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawaharlal Maharaj
PublisherTansukhdas Fusraj Duggad
Publication Year1932
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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