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________________ १३२ प्राचीन तिब्बत उत्कट अभिलाषा प्रकट की। आरस्पा ने सर हिलाया और कहा कि ऐसा होना नितान्त असम्भव है। जब तक अनुष्ठान समाप्त न हो जाय, कोई उसके गुरु के पास तक नहीं जा सकता। ___मैं समझ गई कि इसके साथ तर्क करना व्यर्थ है। चुप रही और सोचा कि जब यह बास्पा हमारा साथ छोड़कर अलग हो जायगा तब हम लोग भी चुपके चुपके इसका पीछा करेंगे। सम्भव है, इस प्रकार अकस्मात् पहुँचकर अनुष्ठान करते हुए बोन्पो जादूगर की एक झलक देखने को मिल जाय। मैंने अपने नौकरों को उस डान्स्पा पर ध्यान रखने की चेतावनी कर दी। मालूम होता है, कारस्पा मेरा आशय ताड़ गया। उसने यह भी अनुभव किया होगा कि हम लोगों के बीच में उसकी हालत कुछ-कुछ नजरबन्द कैदियों की सी थी। लेकिन अस्पा ने किसी बात का बुरा न माना । उसने हंसते-हसते मुझसे कहा भी"यह न समझिएगा कि मैं भाग जाऊँगा। अगर आपको मंशा हो तो आप मुझे रस्सियों से जकड़ दीजिए। मुझे आपसे पहले वहाँ पहुँचने को आवश्यकता ही नहीं है। मेरा गुरु पहले से ही सब जान गया है। 'डग्इस लक् गी तेक ला तेन ताङ् त्सार' मैंने मानसिक संक्रमण से सूचना भेज दी है।" ___ मैंने उसकी बात पर कुछ ध्यान न दिया। मैं जानती थी कि ये लोग बड़ी-बड़ी डींगें मारने में पक्के उस्ताद होते हैं। अक्सर झूठमूठ अद्भुत-अद्भुत शक्तियों का उपयोग में लाने का दम भरते हैं। किन्तु इस बार मेरी धारणा गलत साबित हुई। हम लोग दरै को पार करके बाहर निकले। हमारे सामने अब खुला मैदान था। डाकुओं का भय न रहा और चीनी व्यापारी हमसे बिदा लेकर अलग हो गये। मेरी इच्छा अब भी अपने साथी कारस्पा का पीछा करने की थी कि एकाएक छः Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, kurnatumaragyanbhandar.com
SR No.034584
Book TitlePrachin Tibbat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamkrushna Sinha
PublisherIndian Press Ltd
Publication Year
Total Pages182
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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