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________________ मीता अः १२ मो. यस्मान्नोद्विजते लोको लोकानो हिजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगै र्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १६ ॥ शब्दार्थ-जेनाथी कोई पण प्राणी उद्वेग पामतुं नथी. तथा जे कोई प्राणीथी उद्वेग पामतो नथी अने हर्ष अदेखाई भय अने उद्वेमथी मुक्त ते मारो प्रिय. अने कर्म केवा आचरवा ते विषे. गीता अ. १६ अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाधायस्तप आर्जवम् ॥१॥ अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोल्यत्वं मार्दवं हीरचापलम् ॥२॥ तेजःक्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्यभारत ॥३॥ भावार्थ-उपरना त्रण श्लोकथी एवो अर्थ थायछे के अभय, अन्तःकरणनी शुद्धि, ज्ञान, अने योगमां स्थिति, दान, अने इन्द्रियनो निग्रह, तथा यज्ञ, अने स्वाध्याय, तप, सरलता ॥ १ ॥ अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, अपैशुन, भूतोमां दया, ललुता न थवी, मार्दव, अकार्यमां लोक लजा, अचलपणुं ॥२॥ तेज, क्षमा, धीरज, पवित्रता, अद्रोह, अत्यन्त लघुपणानी भावना, सत्य गुणवाली लक्ष्मी [दैवीं] ए तमाम पामीने अंते मोक्ष पामे छे ॥३॥ हवे क्षत्रियोने उपरना धार्मिक कर्मो उपरान्त लौकिक स्वकर्म नीचे प्रमाणे छे. गीता अ. १८ मो श्लोक ४३ शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३॥ अर्थ-शौर्य, तेज, धीरज, चतुराई, ने युद्धमा न नासवं, दान तथा ईश्वर उपर व [ ९ सात ] स्वभावथी थएलां क्षत्रियनां कर्मो छे. का--शौर्य-अत्यन्त बलवान पुरुषोने पण प्रहार करवामां प्रवृत्ति. पराक्रम-तेज शत्रुओथी अपराभवपणुं-प्रागल्भ्य. धृति-महान विपत्तिमां देह होय तो पण इन्द्रियोने अव्याकुल राखवी. चतुराई-अचानक आवी पडेलां कार्योमां पण मोहथी रहित जे प्रवृत्ति ते. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034575
Book TitlePashu Vadhna Sandarbhma Hindu Shastra Shu Kahe Che
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Shwetambar Conference
PublisherJain Shwetambar Conference
Publication Year
Total Pages309
LanguageGujarati, Hindi, English
ClassificationBook_Gujarati, Book_Devnagari, & Book_English
File Size24 MB
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