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(२) भावार्थ:-भगवान् की (मूर्ति) पूजा भाव से पाप को काट गिराती है, दुर्गति (दरिद्रता) को नाश करती है, आपत्ति को मार भगाती है, पुण्य को इकट्ठा (संग्रह ) करती है, लक्ष्मी को बढ़ाती है, नीरोग्ता को पुष्ट करती है, सौभाग्य को करती है, हर्ष को पल्लवित (विस्तार ) करती है, यश को उत्पन्न करती है, स्वर्ग को देती है और निति (मोक्ष) की रचना करती है ॥ ३ ॥
त्रिसन्ध्यं देवाचा विरचय चयं प्राश्य यशः श्रियः पात्रे वापं जनय नय मार्ग नय मनः । स्मरक्रोधाद्यान् दलय कलय प्राणिषु दयां, सदुक्त सिद्धान्तं शणु वृणु सखे ! मुक्ति कमलाम् ॥४॥ भावार्थ:-हे मित्र, तीनों काल देवताओं की पूजा करो, कीर्ति को फैलाश्री, श्री ( लक्ष्मी-सम्पत्ति ) को सुपात्रों में वपन करो अर्थात् सुपात्रों को दान दो, नीति के मार्ग पर मन को ले जानो, काम-क्रोध आदिक शत्रुओं को नाश करो, प्राणियों पर दया करो, सच्छास्त्र एवं सज्जन पुरुषों के कहे हुये सिद्धान्त को सुनो और मुक्ति (मोक्ष-कैवल्य ) रूपिणी कमला (लक्ष्मी) को घरो अर्थात् ग्रहण करो ॥ ४ ॥
हतप्रज्ञो व्यर्थ प्रलपति बहु स्वार्थनिरत, स्तबीयाक्ति हित्वाऽऽगमसुगम-मागांननुसर ।। नरत्वं दौलभ्यं जगति बहु योनिष्वपि सखे ! ह्यतोऽम्माभिर्भाव्यं खलु मननशीलैः प्रति पलम् ॥५॥ भावार्थ:-परमार्थ तत्व को नहीं जाननेवाले हतबुद्धि लोग स्वार्थान्ध होकर बहुत कुछ अन्ट सन्ट बकते हैं, अतः उनकी
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