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________________ [४७] हुवा, तथा इन्द महाराजने अवधिज्ञानसे भगवानको देखे भी नहीं और नमुत्थुणं वगैरह कुछभी नहीं किया,तोभी उन्हीको कल्याणकपना मानते हैं और कल्पसूत्रमूल तथा उन्हीकी सबी टीकाओके अनु. सार तो यही सिद्ध होता है, कि- ८२ दिन गये बाद गर्भापहाररूप दूसरे च्यवन कल्याणकके दिनमें आसोज वदी १३ को इन्द्रमहाराजने अवधिज्ञानसे भगवानको देखे, तब हर्षसहित सिंहासनसे नीचे उत्तर कर विधिपूर्वक 'नमुत्थु णं' किया और हरिगणमेषिदेवको आज्ञा करके त्रिशलामाताकी कुक्षिमें स्थापित करवाये, तब त्रिशलामाताने आसोज वदी १३ की रात्रिको तीर्थकर भगवानके अव. तार लेनेकी सूचना करानेवाले १४ महास्वप्न देखे हैं। और कलि. काल सर्व विरुद धारक श्रीहेमचन्द्रसूरिजी महाराजने तो 'श्रीत्रिषष्ठिशलाका पुरुषचरित्र' के दशवेपर्वमें श्रीमहावीरस्वामिके चरि में लिखाहै, कि-गर्भापहारकेदिन आसोजवदी १३को इन्द्रमहाराजकाआसनचलायमान होनेसे अवधिज्ञानसे भगवानको देखकर नमः स्काररूप ' नमुत्थु णं' किया और हरिणेगमोषिदेव द्वारा त्रिशलाके गर्भमें स्थापित करवाये, तब त्रिशलामाताने तीर्थकर भगवान के अ. वतार लेनेकी सूचना करानेवाले १४महा स्वप्न देखेहैं, उसके बाद खास इन्द्रमहाराजने त्रिशलामाताकेपासमें आकर १४ स्वप्न देखनेसे उसका फल तीर्थकर पुत्र होनेका कहाहै, तथा धनभंडारीको आशा करके देवताओं द्वारा धन धान्यादिकसे सिद्धार्थ राजाके राज्य ऋद्धिकी भंडारादिमें वृद्धि कराई है, इत्यादि अनेक बातें च्यवन कल्याणकपनकी सिद्धि करनेवाली प्रत्यक्षमें हुयी हैं । इसलिये इन्हको गर्भापहाररूप दूसरा च्यवन कल्याणक मानते हैं । उसका भावार्थ समझे बिनाही कल्याणकपनेका निषेद्ध करनेकेलिये राज्याभिषेककी बात बीचमें लाते हैं, मगर श्रीऋषभदेव भगवानके राज्याभिषेकमें तो किसीभी कल्याणकपनेके कोई भी लक्षण नहीं हैं इसलिये राज्याभिषेकको कोईभी कल्याणक नहीं मानसकते. परंतु इस अघर्पिणीमें प्रथम राज्याभिषेक उत्तराषाढा नक्षत्रमें इन्द्रमहाराजने किया, भौर प्रथम राज्यप्रवृत्ति चलाया, उसकी यादगिरीके लिये केवल राज्याभिषेकका नक्षत्र मात्रही च्यवनादि कल्याणकोंके साथ बत. लाया है, उसका भावार्थ समझे बिना उसकोभी कल्याणकपना ठह. रानेका आग्रहकरना या राज्याभिषेकके समान गर्भापहारकोभी क. ल्याणकपने रहित ठहराना सोभी गर्भापहारके और राज्याभिषेकके Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034484
Book TitleBruhat Paryushana Nirnay
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManisagar
PublisherJain Sangh
Publication Year1922
Total Pages556
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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