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________________ ब्रह्मचर्य-अणुव्रत आदि सारे सद्गुण समाप्त हो जाते हैं और वह निस्तेज जीवन व्यतीत करता है । अणुव्रती उससे प्रति क्षण बचता रहे। स्पष्टीकरण स्त्री-संसर्गके अतिरिक्त वीर्य स्खलित कर देनेके सारे प्रकार अप्राकृतिक मैथुन माने गये हैं। ३-दिनमें सम्भोग न करना । स्वास्थ्य और मानवीय सभ्यताके प्रतिकूल होनेसे दिवा-सम्भोग अणुव्रतीके लिये विवर्जित है। ४-४५ वर्षकी आयुके बाद विवाह न करना । वृद्ध-विवाह सब प्रकारसे वर्जनीय है। आवश्यकता तो यह है कि विवाहितअणुव्रती भी पैंतालीस या पचास वर्षके पश्चात् पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करे । इस उम्रमें स्त्री-वियोग हो जाता है तब तो उसे पूर्ण ब्रह्मचारी होकर रहना ही है। वृद्ध-विवाह राजकीय नियमसे भी निषिद्ध है और अन्यान्य विविध दुविधाओंका भी घर है। किसी भी स्थितिमें अणुव्रती अपने आदर्शसे विचलित न हो। ५-एक पत्नीके होते दूसरा विवाह न करना । स्पष्टी करण--जहाँ पत्नी सहर्ष आज्ञा देती हो वहाँ उक्त नियम बाधक नहीं है। प्राचीन कालमें बहु विवाहकी प्रथा थी। एक-एक राजा-महाराजा सैकड़ों और सहस्रों स्त्रियां रखते थे ऐसा पुराणादि ग्रन्थोंसे मालूम होता है किन्तु आजके युगमें यह एक घृणित प्रथा बन चुकी है। अणुव्रती के लिये न तो बहु-विवाह उपादेय है न वह अपने आदर्शके अनुसार किसी स्त्रीको रखेलीके रूपमें रख सकता है। स्पष्टीकरण किसीकी स्त्री वंध्या, उन्माद-अस्त व अन्य किसी भयङ्कर बीमारीसे अस्त हो और वह सहर्ष दूजे विवाहके लिदे अनुमति देती हो तो उक्त नियम बाधक नहीं होगा। १२ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034471
Book TitleAnuvrat Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagraj Muni
PublisherAnuvrati Samiti
Publication Year1954
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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