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________________ सत्य अणुव्रत 'सच्चं लोगम्मि सारभूयं'-सत्य ही लोकमें सारभूत है, इसमें विश्वास रखते हुए अणुव्रतीको छोटे-बड़े सब प्रकारके असत्यसे बचनेका प्रयत्न करना चाहिए। मानवता के प्रत्यक्ष घातक असत्यसे बचना तो उसके लिये अनिवार्यता आवश्यक है। इस सम्बन्धमें निम्नाङ्कित नियमोंका पालन अणुव्रतीके लिये अनिवार्य है : १-जमीन-मकान, पशु-पक्षी, सोना-चान्दी, धन-धान्य तथा घीतेल, आंटा आदि खाद्य पदार्थ या अन्य किसी वस्तुके क्रय-विक्रयके समय, माप, तोल, संख्या आदिके विषय में असत्य न बोलना। एक ही नियमसे क्रय-विक्रयके सम्बन्धसे बोले जानेवाले अधिकांशतः असत्योंका निरोध हो जाता है। नियम सुस्पष्ट है तथापि सर्वसाधारण इसकी व्यापकताको समझ सकें इसलिये नियमके एक-एक पहलूपर प्रकाश डाला जाता है : जमीन मकानके सम्बन्धमें । क-किसी दूसरे व्यक्तिकी जमीन व मकानको अपना बताकर उसका पट्टा व ख़त अपने नामसे बना लेना।। ___ ख-दूसरेकी अच्छी जमीन व मकानको अशुभ व अन्य किसी प्रकारसे दोषयुक्त बताना। ग-मकान-जमीन दूसरेकी हो या अपनी जमीन दूसरेके रेहन हो या उस जमीनके और भी हिस्सेदार हों ऐसी जमीन अपनी कहकर बेचना । घ-कुँवा, मन्दिर, धर्मशाला आदि बनानेका व जीर्णोद्धार करनेका झूठा बहाना करके लोगोंसे चन्दा लेना। 3-अपनी जमीनकी कीमत बढ़ानेके लिये झूठ-मूठ कह देना, अमुक व्यक्ति मेरी जमीनके इतने रुपये कह चुका है। च-अपने मकान आदिकी फॉल्स रजिस्ट्री करवाकर उसे दूसरेका बताना आदि। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034471
Book TitleAnuvrat Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagraj Muni
PublisherAnuvrati Samiti
Publication Year1954
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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