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________________ अहिंसा - अणुव्रत ४३ व्यवहारोंका निषेध करता हैं। बहुतसे व्यक्ति गाय भस आदि पशुओं को इस प्रकार निर्दयता से पीटते हैं कि दर्शकके रोम खड़े हो जाते हैं । इसलिये नियममें प्रहार शब्द विशेषतः जोड़ा गया है। अणुव्रतीको ऐसे निर्दयतापूर्ण प्रहार करनेसे वह रोकता है । और भी अनेकों क्रूर ( निर्दयतापूर्ण ) व्यवहार हुआ करते हैं, उनसे भी अणुव्रती को बचते रहना होगा । किसी आक्रमणकारी पशु व अन्य प्राणीके सम्बन्धमें उक्त नियम लागू नहीं है। १२ - चिकित्साके अतिरिक्त किसी प्राणीका अङ्ग-विच्छेद न करना, तप्त शलाका या अन्य कष्टदायक तरीकेसे त्रिशूलादि चिह्न अङ्कित न करना । क्रोध, द्वेष व लोभादिवश किसी मनुष्य व इतर प्राणी के हाथ, पैर, आँख, कान व नाक आदि का छेद करना घोर हिंसा है। वृषभादिको क्लीव करना भी तत्प्रकार की हिंसामें सम्मिलित है । उक्त नियम एतद् विषयक हिंसाका स्पष्ट निषेध करता है । बैल, ऊँट आदि पर चक्र त्रिशूलादि भी तप्तशलाका से लोग करते हैं । कोई विशेष प्रयोजनसे तथा कोई केवल सुन्दरताके लिये । कष्टदायक सभी प्रकार साधारणतया विवर्जित है । स्पष्टीकरण चिकित्सा के उद्देश्यसे हाथ, पैर आदिका विच्छेद व त्रिशूल आदि अङ्कित करना नियम-निषिद्ध नहीं है । लड़के-लड़कियोंके कान-नाक आदि बिंधवाना अंगच्छेद नहीं है । १३- किसी प्राणीको कठोर बन्धनसे न बांधना । . गाय, भैंस आदि पशुओंको बांधना खोलना पड़ता है किन्तु अणुव्रती को यह ध्यान रखना आवश्यक होगा कि उस बन्धन-क्रियामें निदर्यताकी सूचना तो नहीं होती है । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034471
Book TitleAnuvrat Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagraj Muni
PublisherAnuvrati Samiti
Publication Year1954
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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