SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 118
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १०८ अणु-दृष्टि २ - प्रतिमास एक उपवास करना, यदि साध्य न हो तो प्रतिमास दो दिन एक-एक बारसे अधिक न खाना । प्रतिमास एक या दो उपवास कर लेना आत्म शुद्धि के साथ-साथ शरीर शुद्धि के लिये भी उपयोगी है। वर्तमानकी अन्न समस्याका भी यह एक सजीव हल है । उपवासका तात्पर्य है सूर्योदयसे लेकर दूसरे दिन सूर्योदय तक जलके अतिरिक्त कुछ नहीं खाना पीना । उपवासकी असाध्यतामें दो एकासनका विधान है। एकासनका अर्थ एकासनस्थित एक बारसे अधिक सूर्योदयसे सूर्योदय तक न खाना । ३ - प्रतिदिन कमसे कम १५ मिनट आत्म-चिन्तन करना । आत्म- अवलोकन मात्र ही इस बातकी ओर संकेत करता है। व्यक्ति दोषोंसे मुक्ति चाहता है वह आत्मस्थित एक - एक दोषको प्रतिदिन ध्यानपूर्वक देखता है और उसे बिदा कर देनेकी शक्ति बटोरता है । ध्यान किस प्रकार से किया जाय, इसके लिये व्यक्ति स्वतंत्र है। जीवनगत बुराइयों का अवलोकन उसमें होना चाहिये । सर्व साधारणके लिये आत्म-चिन्तन का एक साधन सम्मुख रहे इसलिये आचार्यवरने एक 'आत्म-चिन्तन' निर्धारित भी कर दिया है जो नीचे दिया जाता है । अणुव्रती उसके आधारसे या उस प्रकार से प्रतिदिन आत्म-चिन्तन करे । आत्म-चिन्तन (१) भौतिक सुखों में आसक्त होकर आत्मोन्नति के प्रमुख लक्ष्यको भूला तो नहीं ? (२) स्व-प्रशंसा और पर - निन्दासे प्रसन्नता तो नहीं हुई और स्व-निन्दा व पर-प्रशंसासे अप्रसन्नता तो नहीं हुई ? (३) अपने मुँह से अपनी बड़ाई तो नहीं की ? (४) किसीका झूठा पक्ष लेकर विवाद तो नहीं फैलाया और किसीको अपमानित करनेकी कोशिश तो नहीं की ? (५) किसी की निन्दा तो नहीं की ? (६) किसी की उन्नति व ऐश्वर्य देखकर ईर्ष्या तो नहीं की ? Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034471
Book TitleAnuvrat Drushti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNagraj Muni
PublisherAnuvrati Samiti
Publication Year1954
Total Pages142
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy