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________________ (५०) • एवं व्यन्तर देवतावका अलापक परन्तु स्थित्ति मनुबन्ध और गमाकाल सब स्थानमें, ज० दशहजार वर्ष उ० एक पल्योपय समझना । इसी माफीक ज्योतीषी देवतावों भि समझना । परन्तु ज्योतीshah पांच भेद है जिन्होंकि स्थिति (१) चन्द्र देवोंकी ज० पावपल्योपम उ० और एक लक्ष वर्ष अधिक समझना | एक पल्योपम (२) सूर्यदेवों की ज० पाव० उ० एक पल्यो० हजार वर्ष । (३) ग्रहदेवोंकी ज० पाव० उ० एक पल्योपम । (४) नक्षत्रदेवोंकी ज० पाव० उ० आदेपल्योपम । (९) तारादेवों की ज० उ० । ज्योतीषीदेव चक्के पृथ्वी कायमें ज० अन्तरमहूर्त उ० २२००० वर्षकि स्थितिमें उत्पन्न होते है जिसके ऋद्धिके २० द्वार असुर कुमारकि माफीक परन्तु - (१) लेश्या एक तेजसलेश्यावाला । (२) ज्ञान तीन तथा अज्ञान तीन कि नियमा । (३) स्थिति जघन्य उ० एक पल्यो ० लक्ष वर्ष । ( 8 ) अनुबन्ध स्थितिकि माफीक | (५) संभहों, ज० दोय भव उ० दोयभव, काल ज० पल्योपमके आठवे भाग और अन्तर महुर्त उ० एक पल्योपम उपर एक लक्ष बाबीसहजार वर्ष अधिक । नौ गमा पूर्ववत् लगालेना परन्तु स्थिति ज्योतीषी देव और पृथ्वी कायकि समझना ।
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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