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________________ २५५ बनाया हो, इधर उधर लाते, ली जाते हो, जिसका रुप ही अदर्शनीय है. जहांपर ऐसा कार्य हो रहा है, उसीकी तर्फ जानेकी अभिलाषा, पिपासा, इच्छा ही साधुवों को न करनी चाहिये. अगर करे, करावे, करतेको अच्छा समझे. वह मुनि प्रायश्चित्तका भागी होगा. कारण-वह जातेमें लोगोंको शंकाका स्थान मिलेगा. (१८६) , देवोंको नैवेद्य चढाने के लीये, जो अशनादि आहार तैयार कीया है, उसकी अन्दरसे आहार ग्रहन करे. ३ यह लोकविरुद्ध है. कदाच देवता कोपे तो नुकशान करे. (१८७ ) ,, जो कोइ साधु साध्वी जिनाज्ञा विराधके अपने छंदे चलनेवाले है, उसकी प्रशंसा करे. ३ (१८८) ऐसे स्वच्छंदे चलनेवालोंको वन्दे. ३ इसीसे स्वच्छंदचारीयोंकी पुष्टि होती है. ( १८९ ) ,, साधुवोंके संसारपक्षके न्यातीले हो, अ न्यातीले हो, श्रावक हो, अन्य गृहस्थ हो, परन्तु दीक्षाके योग्य न हो, जिसमें दीक्षा ग्रहन करनेका भान भो न हो, ऐसा अपात्रको दीक्षा देवे. ३ भावार्थ-भविष्यमें बडा भारी नुकशानका कारण होता है. ( १९० ,, अगर अज्ञातपनेसे ऐसे अपात्रको दीक्षा दे दी हो, तत्पश्चात् ज्ञात हुवा कि-यह दीक्षाके लीये अयोग्य है. उसको पंचमहाव्रतरुप वडोदीक्षा देवे. ३ ( १९१ ) अगर वडोदीक्षा देने के बाद ज्ञात हो कि-यह संयमके लीये योग्य नहीं है. ऐसेको ज्ञान, ध्यान देवे, सूत्रसिद्धांतकी वाचना देवे, उसकी चैयावच्च करे, साथ में एक मंडले. पर भोजन करे, करावे, करतेको अच्छा समझे. भावना पूर्ववत्.
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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