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________________ २५० भावार्थ-जैसे जैन मुनियोंके पर्युषण होते है, इसी माफिक अन्य तीर्थी लोग भी अपनी ऋषि पंचमी आदि दिनको मुकर कीया है. वह अन्यतीर्थी कहे कि-हे मुनि! तुमारा पर्युषण ह. मको करावे और हमारा पर्युषण तुम करो. ऐसा करना साधु साध्वीयोंको नहीं कल्पै. (४८) ,, आषाढी चातुर्मासीके बाद साधु साध्वी वन, पात्र ग्रहन करे. ३ भावार्थ-जो वस्त्रादि लेना हो, वह आषाढ चातुर्मासी प्रतिक्रमण करने के पेस्तर ही ग्रहन कर लेना. बाद में कार्तिक चातुमासी तक धन नहीं ले सक्ते है.+ उपर लिखे ४८ बोलोंसे कोइ भी बोल सेवन करनेवाले साधु साध्वीको गुरु चातुर्मासिक प्रायश्चित्त होता है. प्रायश्चित्त विधि देखो वीसवां उद्देशामें. इति श्री निशिथसूत्र-दशवां उद्देशाका संक्षिप्त सार. (११) श्री निशिथसूत्र-इग्यारवां उद्देशा. (१) 'जो कोइ साधु साध्वी ' लोहाका पात्र करे, करावे, करतेको अच्छा समझे. (२) एवं लोहाका पात्राको रखे. + समवायांगसूत्र-“समणे भगवं महावीरे सबीसइ राइ मास वइक्रते सत्तरिएहिं राइदिएहि संसेहिं वासाबासं पज्जोसमेइ' अर्थात् आषाढ चातुर्मासीसे पचाश दिन और कार्तिक चातुर्मासिके सीत्तर दिन पहला सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करना साधुवोंको कल्पे.
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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