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________________ २३२ "" ( ६८ ) परिमाणसे अधिक 'रजोहरण' अर्थात् चौषीश अंगुलकी दंडी और आठ अंगुलकी दशीयों एवं वत्रीश अंगुलका रजोहरण से अधिक रखे, दुसरोंसे रखावे, अन्य रखते हुवेको अच्छा समझे, अथवा सहायता देवे. * " ( ६९ ) रजोहरणकी दशीयोंको अति सुक्षम ( बारीक) करे. ३ प्रथम तो करणेमें प्रमाद बढ़ता है. और उसकी अन्दर जीवादि फँस जानेसे विराधना भी होती है. ( ७० ) रजोहरणकी दशीयोंपर एकभी बन्धन लगावे. ३ ( ७१ ) एवं ओघारीया में दंडी और दशीयों बन्धनके लीये तीन बन्धसे ज्यादा बन्धन लगावे. ३ ( ७२ ) एवं रजोहरणको अविधिसे बन्धे. नीचा उंचा, शिथिल, सख्त इत्यादि. ३ (७३) एवं रजोहरणको काष्ठकी भारीके माफिक बिचमें बन्ध करे. जिससे पूर्ण तौरपर काजा नीकाला नहीं जावे. जीaat यतना भी पूर्ण न हो सके इत्यादि. ( ७४ ) रजोहरणको शिरके नीचे (ओशीकाकी जगह ) "" धरे. ३ ( ७५ ),, बहु मूल्यवालो तथा वर्णादिकर संयुक्त रजोहरण रखे. ३ चौरादिका भय तथा ममत्व भावकी वृद्धि होती है. ( ७६ ),, रजोहरणको अति दूर रखे तथा रजोहरण बिगर इधर उधर गमनागमन करे. ३ 29 ( ७७ ) रजोहरण उपर बैठे. ३ कारण रजोहरणको शास्त्रकारोंने धर्मध्वज कहा है. गृहस्थोंको पूजने योग्य है. * ढुंढीये लोग इस नियमका पालन कैसे करते होंगे ? कारण क — दो दो हाथके लंबे रजोहरण रखते है. इस वीरवाणीपर कुछ विचार करना चाहिये.
SR No.034235
Book TitleShighra Bodh Part 21 To 25
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year
Total Pages419
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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