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________________ ३६ बोल. ( २५५ ) O क्षेत्रकालानुकूल० तत्वानुरूप० प्रस्तुत व्याख्या० परस्पर अविरुद्ध अभिजात अति स्निग्ध० मधुर० अन्य मर्मरहित. अर्थ धर्मयुक्त० उदार परनिंदा स्वश्लाघा रहित० उपगतश्लाघा० अनयमीत० कुतूहल रहित० अद्भूत स्वरूप० विलंब रहित० विमादि दोष रहित विचित्रवचन० आहित विशेष० साकार विशेष० o सत्व विशेष० खेद रहित० अव्युच्छेद• ० ( ३६ ) उत्तराध्ययन सूत्र के ३६ अध्ययन - विनय० परिसह चउरंगिय० असंक्खय० अकाम सकाम मरण० खुड्डानियठि० एल० काविल० नमिपव्वझा० दुमपत्तय वहुस्सुय• हरिएसबल० चित्तसंभू० उसुयार० भिक्खू वंभचेरसमाहि० पावसमण संजईरायः मियांपुती० महानिगंधी० समुद्रपालिय० रहनेमी० केसीगोयमः पवयणमाया० जयघोस विजयघोस० सामायारी० खलुकि० मुक्खमग्गई० समत परिकमिय० तवमगाय० चरणविहीय० पमायठाण० अठकम्मप्पगडी० लेस ० अणगारमग्ग० जीवजीव विभत्ती ० इति । सेवंभंते सेवंभंते - तमेवसच्चम् →→→*@@@*<--- थोकडा नम्बर ३४. श्री भगवतीजीसूत्र श० २५ उ० ६ ( निग्रन्थोंके ३६ द्वार ) पन्नषणा - प्ररूपणा वेय- वेद ३ राग- सरागी २ कप्प-कल्प चारित्र - सामायिकादि ९ डिसेवण-दोष लागेके नहीं ?
SR No.034231
Book TitleShighra Bodh Part 01 To 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherSukhsagar Gyan Pracharak Sabha
Publication Year1924
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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