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________________ ५० श्रीवीतरागस्तोत्रम् सकता है ? आप ऐसा चरित्र क्यों कर रहे हैं ? इस तरह आपको कोई भी नहीं पूछ सकता है । (६) तथा समाधौ परमे, त्वयात्मा विनिवेशितः । सुखी दुःख्यस्मि नास्मीति यथा न प्रतिपन्नवान् ॥७॥ , अर्थ - [हे भगवन् !] आपने आपनी आत्मा को इस तरह उत्तम समाधि में स्थापित किया है कि जिसे मैं सुखी हूँ ? कि दु:खी हूँ ? कि नहीं हूँ ? इस तरह जरा भी आपने नहीं स्वीकारा । अर्थात् आप संकल्परहित हैं । (७) ध्याता ध्येयं तथा ध्यानं, त्रयमेकात्मतां गतम् । इति ते योगमाहात्म्यं, कथं श्रद्धीयतां परैः ? ॥८ ॥ अर्थ - हे स्वामिन् ! ध्याता, ध्येय और ध्यान ये तीन आप में एकत्व को (अभेद को) पाये हैं । ऐसे आपके योग महात्म्य को अन्य जन (सूक्ष्ममार्ग को नहीं जानने वाले लोग) किस तरह श्रद्धा करें ? अर्थात् किस तरह मानें। (८)
SR No.034155
Book TitleVitrag Stotram
Original Sutra AuthorHemchandracharya
Author
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages70
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size1 MB
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