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________________ कुमारी न यथा वेत्ति सुखं दयितभोगजम् । न जानाति तथा लोको योगिनां समतासुखम् ॥२०॥ भावार्थ : जैसे कुंआरी कन्या पति-सहवास के सुख को नहीं जानती, वैसे ही सांसारिक लोग योगिजनों को प्राप्त होने वाले समतासुख को नहीं जानते ॥२०॥ नति-स्तुत्यादिकाशंसाशरस्तीव्रः स्वमर्मभित् । समतावर्मगुप्तानां नार्तिकृत्सोऽपि जायते ॥२१॥ भावार्थ : नमस्कार, स्तुति, प्रशंसा, यश आदि की लिप्सा वे तीखे बाण हैं, जो साधक की आत्मा के मर्मस्थान का भेदन कर देते हैं; परन्तु समतारूपी कवच (बख्तर) पहनकर जिन्होंने पहले से ही अपनी आत्मा की सुरक्षा कर ली है, उन्हें ये सब पीड़ाकारी नहीं होते ॥२१॥ प्रचितान्यपि कर्माणि जन्मनां कोटिकोटिभिः । तमांसीव प्रभा भानोः क्षिणोति समता क्षणात् ॥२२॥ भावार्थ : जैसे सूर्य की प्रभा घने से घने अन्धकारसमूह को क्षणभर में नष्ट कर देती है, वैसे ही कोटि-कोटि जन्मों के संचित कर्मों को समता एकक्षण में नष्ट कर देती है ॥२२॥ अन्यलिंगादिसिद्धानामाधारः समतैव हि। रत्नत्रयफलप्राप्तेर्यया स्याद् भावजैनता ॥२३॥ अधिकार नौवाँ ९३
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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