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________________ भावार्थ : अगर ऐसा न हो तो अभाव के सम्बन्ध में अन्वेषण करने में क्या गति होगी? इसलिए आधार और प्रतियोगी इन दोनों के विषय में वह सम्बन्ध रहता है, परन्तु उन दोनों में पृथक्-पृथक् नहीं रहता ॥२८॥ स्वान्यपर्यायसंश्लेषात् सूत्रेऽप्येवं निदर्शितम् । सर्वमेकं विदन्वेद सर्वं जाह्नस्तथैककम् ॥२९॥ भावार्थ : स्वपर्याय और परपर्याय के संश्लेषण (सम्बन्ध) से सूत्र में सर्व एक ही है, ऐसा कहा गया है । यानी एक द्रव्य को जानने वाला सर्वद्रव्य को जानता है, और सर्वद्रव्य को जानने वाला एक द्रव्य को सम्पूर्ण जानता है ॥२९॥ आसत्तिपाटवाभ्यास-स्वकार्यादिभिराश्रयन् । पर्यायमेकमप्यर्थं वेत्ति भावाद् बुधोऽखिलम् ॥३०॥ भावार्थ : आसत्ति, पटुता, अभ्यास, और स्वकार्य आदि को लेकर एक पर्याय का भी आश्रय लेने वाला पण्डितपुरुष भाव से समग्र पदार्थों को जानता है ॥३०॥ अन्तरा केवलज्ञानं प्रतिव्यक्तिर्न यद्यपि । क्वापि ग्रहणमेकांशद्वारं चातिप्रसक्तिमत् ॥३१॥ भावार्थ : यद्यपि केवलज्ञान के बिना प्रत्येक पदार्थ की अभिव्यक्ति नहीं होती, और किसी-किसी विषय में एकांशद्वार अधिकार छठा ६३
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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