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________________ करते हुए बालक के समान चपल मन हो तो वह अभ्यासदशा में इष्ट है ॥११॥ वचनानुष्ठानगतं यातायातं च सातिचारमपि । चेतोऽभ्यासदशायां गजांकुशन्यायतोऽदुष्टम् ॥१२॥ भावार्थ : वचनानुष्ठान में स्थित मन यद्यपि गमनागमन करते समय अतिचार-सहित होता है, फिर भी अभ्यासदशा में गजांकुशन्याय (दृष्टान्त) के अनुसार अदूषित है ॥१२॥ ज्ञानाविचाराभिमुखं यथा यथा भवति किमपि सानन्दम् । अर्थैः प्रलोभ्य बाबैरनुगृण्हीयात्तथा चेतः ॥१३॥ भावार्थ : जैसे-जैसे चित्त कुछ (धर्मकार्य में) आनन्दयुक्त और ज्ञान तथा विचार के सम्मुख होता जाय, वैसे-वैसे बाह्य पदार्थों से उसे प्रलोभन देकर वश करना चाहिए ॥१३॥ अभिरूपजिनप्रतिमां विशिष्टपदवर्णवाक्यरचनां च । पुरुषविशेषादिकमप्यत एवाऽलम्बनं ब्रुवते ॥१४॥ भावार्थ : इसलिए सुन्दर जिनप्रतिमा, विशिष्ट पद, वर्ण और वाक्यरचना को तथा विशिष्ट प्रकार के पुरुषादि को भी आलम्बनभूत कहे गए हैं ॥१४॥ आलम्बनैः प्रशस्तैः प्रायो भावः प्रशस्त एव यतः । इति सालम्बनयोगी मनः शुभालम्बनं दध्यात् ॥१५॥ अधिकार बीसवाँ २९१
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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