SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 243
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ विचित्र प्रकार का विलास भी विवेकीजनों के लिए भय का कारण है ॥७२॥ इत्थमेकत्वामापन्नं फलतः पुण्यपापयोः । मन्यते यो न मूढ़ात्मा नान्तस्तस्य भवोदधेः ॥७३॥ भावार्थ : इस प्रकार पुण्य-पाप के फल की दृष्टि से एकत्व प्राप्त (सिद्ध) हुआ। मगर जो मूढ़ात्मा इस बात को नहीं मानता, उसके भवसागर का अन्त नहीं आता ॥७३॥ दुःखैकरूपयोभिन्नस्तेनात्मा पुण्यपापयोः । शुद्धनिश्चयतः सत्यचिदानन्दमयः सदा ॥७४॥ भावार्थ : इस पूर्वोक्त कारणों से दुःख के ही एक स्वरूप वाले पुण्य और पाप दोनों से आत्मा पृथक् है । क्योंकि शुद्ध निश्चयनय की दृष्टि से आत्मा सदा सत्-चित्-आनन्दमय है ॥४॥ तत्तुरीयदशाव्यंग्यरूपमावरणक्षयात् । भात्युष्णोद्योतशीलस्य घननाशाद् रवेरिव ॥५॥ भावार्थ : जैसे बादलों के मिट (फट) जाने से उष्णप्रकाश के स्वभाववाले सूर्य का रूप दिखाई देने लगता है; वैसे ही आवरण का क्षय होने से तर्यदशा में जाना जा सके ऐसा आत्मा का रूप दिखाई देता है ॥७५॥ जायन्ते जाग्रतोऽक्षेभ्यश्चित्रा धीसुखवृत्तयः। सामान्यं तु चिदानन्दरूपं सर्वदशान्वयि ॥७६॥ अधिकार अठारहवाँ २४३
SR No.034147
Book TitleAdhyatma Sara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay
PublisherAshapuran Parshwanath Jain Gyanbhandar
Publication Year2018
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy