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________________ ६२ देहं धियं चित्प्रतिविम्बमेतं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम् । द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं विवेक-चूडामणि सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम् ॥ २२२ ॥ नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्ममन्तर्बहिः शून्यमनन्यमात्मनः सम्यनिजरूपमेतत् विज्ञाय पुमान्विपाप्मा विरजो विमृत्युः ॥ २२३ ॥ विद्वान् पुरुष घड़ा, जल और उसमें स्थित सूर्यका प्रतिविम्ब - इन सबको छोड़कर जैसे इन तीनोंके प्रकाशक इनसे पृथक् और स्वयंप्रकाशरूप सूर्यको देखता है, उसी प्रकार देह, बुद्धि और चिदाभास- इन तीनोंको छोड़कर बुद्धिगुहामें स्थित साक्षीरूप इस आत्माको अखण्डबोधस्वरूप, सबके प्रकाशक और सत्-असत् दोनोंसे भिन्न, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्म, भीतर-बाहरके भेदसे रहित और अपने आपसे सर्वथा अभिन्न इस - (आत्मा) को भलीभाँति अपना निजरूप जानकर पुरुष पापरहित, निर्मल और अमर हो जाता है। विशोक आनन्दघनो विपश्चित् स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित् । नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्ते विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः ॥ २२४ ॥ वह अति बुद्धिमान् पुरुष शोकरहित और आनन्दघनरूप हो जानेसे कभी किसीसे भयभीत नहीं होता। मुमुक्षु पुरुषके लिये आत्मतत्त्वके ज्ञानको छोड़कर संसारबन्धनसे छूटनेका और कोई मार्ग नहीं है। ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम् । येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः ॥ २२५ ॥ ब्रह्म और आत्मा अभेदका ज्ञान ही भवबन्धनसे मुक्त होनेका कारण
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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