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________________ ४६ देहोऽहमित्येव जडस्य बुद्धिदेहे च जीवे विदुषस्त्वहंधीः । महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः जड पुरुषोंकी 'मैं देह हूँ' - ऐसी देहमें (शास्त्रज्ञ) - की जीवमें और विवेक विज्ञानयुक्त ऐसी सत्य आत्मामें ही अहंबुद्धि होती है। अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशौ ब्रह्मणि निर्विकल्पे सर्वात्मनि विवेकविज्ञानवतो विवेक-चूडामणि सदात्मनि ॥ १६२ ॥ अहंबुद्धि होती है, विद्वान् महात्माकी 'मैं ब्रह्म हूँ' कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व ॥ १६३ ॥ अरे मूर्ख ! इस त्वचा, मांस, मेद, अस्थि और मलादिके समूहमें आत्मबुद्धि छोड़ और सर्वात्मा निर्विकल्प ब्रह्ममें ही आत्मभाव करके परम शान्तिका भोग कर । देहेन्द्रियादावसति भ्रमोदितां विद्वानहन्तां न जहाति यावत् । तावन्न तस्यास्ति विमुक्तिवार्ता प्यस्त्वेष वेदान्तनयान्तदर्शी ॥ १६४ ॥ जबतक विद्वान् असत् देह और इन्द्रिय आदिमें भ्रमसे उत्पन्न हुई अहंताको नहीं त्यागता, तबतक वह वेदान्त-सिद्धान्तोंका पारदर्शी क्यों न हो, उसके मोक्षकी कोई बात ही नहीं है। छायांशरीरे प्रतिविम्बगात्रे यत्स्वप्नदेहे हृदि कल्पितांगे । यथात्मबुद्धिस्तव नास्ति काचि जीवच्छरीरे च तथैव मास्तु ॥ १६५ ॥ छाया, प्रतिविम्ब, स्वप्न और मनमें कल्पित किये हुए शरीरोंमें जिस
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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