SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 33
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३६ विवेक-चूडामणि इस प्रकार तीनों गुणोंके निरूपणसे यह अव्यक्तका वर्णन हुआ। यही आत्माका कारण-शरीर है। इसकी अभिव्यक्तिकी अवस्था सुषुप्ति है, जिसमें बुद्धिकी सम्पूर्ण वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं। सर्वप्रकारप्रमितिप्रशान्ति ीजात्मनावस्थितिरेव बुद्धेः। सुषुप्तिरेतस्य किल प्रतीतिः किञ्चिन्न वेग्रीति जगत्प्रसिद्धेः ॥ १२३॥ जहाँ सब प्रकारकी प्रमा (ज्ञान) शान्त हो जाती है और बुद्धि बीजरूपसे ही स्थिर रहती है, वह सुषुप्ति अवस्था है इसकी प्रतीति 'मैं कुछ नहीं जानता'-ऐसी लोक-प्रसिद्ध उक्तिसे होती है। अनात्म-निरूपण देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादयः सर्वे विकारा विषयाः सुखादयः। व्योमादिभूतान्यखिलं च विश्व मव्यक्तपर्यन्तमिदं हानात्मा॥१२४॥ देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और अहंकार 3. दि सारे विकार, सुखादि सम्पूर्ण विषय, आकाशादि भूत और अव्यक्तपर्यन्त निखिल विश्व-ये सभी अनात्मा हैं। माया मायाकार्यं सर्वं महदादि देहपर्यन्तम्। असदिदमनात्मकं त्वं विद्धि मरुमरीचिकाकल्पम्॥ १२५॥ माया और महत्तत्त्वसे लेकर देहपर्यन्त मायाके सम्पूर्ण कार्योंको तू मरुमरीचिकाके समान असत् और अनात्मक जान। आत्म-निरूपण अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि स्वरूपं परमात्मनः । यद्विज्ञाय नरो बन्धान्मुक्तः कैवल्यमश्नुते॥१२६॥ 133 विवेक-चूडामणि-20
SR No.034107
Book TitleVivek Chudamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages153
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy