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________________ CEO श्रमण सूक्त २७५ - पडिलेहेइ पमत्ते - अवउज्झइ पायकबल। पडिलेहणाअणाउत्ते पावसमणि त्ति वुच्चई। पडिलेहेइ पमत्ते से किचि हु निसामिया। गुरुपरिभावए निच्च __ पावसमणि त्ति वुच्चई। बहुमाई पमुहरे थद्धे लुद्धे अणिग्गहे। असविभागी अचियत्ते पावसमणि त्ति वुच्चई। (उत्त १७ . ६-११) जो असावधानी से प्रतिलेखन करता है, जो पाद-कम्बल को जहा-कहीं रख देता है, इस प्रकार जो प्रतिलेखना में असावधान होता है, वह पाप-प्रमण कहलाता है। ___जो कुछ भी बातचीत हो रही हो उसे सुनकर प्रतिलेखना मे असावधानी करने लगता है.जो गुरु का तिरस्कार करता है, शिक्षा देने पर उनके सामने बोलने लगता है, वह पाप-प्रमण कहलाता है। जो बहुत कपटी, वाचाल, अभिमानी, लालची, इन्द्रिय और नन पर नियंत्रण न रखने वाला, भक्त-पान आदि का सविभाग न करने वाला और गुरु आदि से प्रेम न रखने वाला होता है, वह पाप-प्रमण कहलाता है। -
SR No.034105
Book TitleShraman Sukt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreechand Rampuriya
PublisherJain Vishva Bharati Samsthan
Publication Year2000
Total Pages490
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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