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श्रमण सूक्त
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नीय सेज्ज गइ ठाण
नीय च आसणाणि या नीयं च पाए वदेज्जा नीयं कुज्जा य अजलि।।
(दस ६ (२) - १७)
भिक्षु (आचार्य से) नीची शय्या करे, नीची गति करे, नीचे खडा रहे, नीचा होकर आचार्य के चरणो मे वदना करे और नीचा होकर अञ्जली करे, हाथ जोडे।
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