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श्रमण सूक्त
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सघट्टइत्ता कारण तहा उवहिणामवि ।
खमेह अवराह मे
वएज्ज न पुणो त्तिय ।।
(दस ६ (२) १८)
अपनी काया से तथा उपकरणो से एवं किसी दूसरे प्रकार से आचार्य का स्पर्श हो जाने पर शिष्य इस प्रकार कहे- 'आप मेरा अपराध क्षमा करे, मैं फिर ऐसा नहीं करूगा ।'
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