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श्रमण सूक्त
( १३५ ।
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अप्पणट्ठा परट्ठा वा
सिप्पा णेउणियाणि य। गिहिणो उवभोगट्ठा
इहलोगस्स कारणा।। जेण बधं वह घोर
परियावं च दारुणं। सिक्खमाणा नियच्छति जुत्ता ते ललिइंदिया।।
(दस ६ (२). १३, १४)
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जो गृही अपने या दूसरों के लिए. लौकिक उपभोग के निमित्त शिल्प और नैपुण्य सीखते हैं
वे पुरुष ललितेन्द्रिय होते हुए भी शिक्षा-काल में (शिक्षक के द्वारा) घोर बन्ध, वध और दारुण परिताप को प्राप्त होते
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