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________________ उत्तरखण्ड • श्रीकृष्णावतारकी कथा-व्रजकी लीलाओंका प्रसङ्ग • ९६७ . . . . . . लगी। भगवान् श्रीकृष्णने उस राक्षसोको पहचान लिया इससे यशोदाको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने श्रीकृष्णकी और उसके स्तनोंको खूब दबाकर उसे प्राणोसहित पीना कमरमें रस्सी लपेटकर उन्हें ऊखलमें बाँध दिया और आरम्भ किया। अब तो वह मतवाली राक्षसी छटपटाने स्वयं गोरस बेचने चली गयीं। समस्त पृथ्वीको धारण लगी। उसके स्नायुबन्धन टूट गये। वह काँपती हुई गिरी करनेवाले श्रीकृष्ण ऊखलमें बँधे-ही-वैधे उसे खींचते और जोर-जोरसे चिग्घाड़ती हुई मर गयी। उसके हुए दो अर्जुन वृक्षोंके बीचसे निकले। गोविन्दने चीत्कारसे सारा आकाश-मण्डल गूंज उठा। उसे ऊखलके धक्केसे ही उन दोनों वृक्षोंको गिरा दिया। उनके पृथ्वीपर पड़ी देख समस्त गोप थर्रा उठे। श्रीकृष्णको तने टूट गये और वे बड़े जोरसे तड़तड़ शब्द करते हुए राक्षसीके विशाल वक्षःस्थलपर खेलते देख गोपगण पृथ्वीपर गिर पड़े। उनके गिरनेकी भारी आवाजसे उद्विग्न हो उठे और तुरंत ही दौड़कर उन्होंने बालकको बड़े-बूढ़े गोप वहाँ आ पहुंचे। यह घटना देखकर उन्हें गोदमें उठा लिया। उस समय नन्दगोपने पास आकर बड़ा आश्चर्य हुआ। यशोदाजी भी बहुत डर गयौं और पुत्रको अङ्कमें ले लिया और राक्षसके भयसे रक्षा श्रीकृष्णके बन्धन खोलकर आश्चर्यमग्न हो उन महात्माको करनेके लिये गायके गोबरसे और बालसे बालकके अपने स्तनोंका दूध पिलाने लगीं। माताने जगदीश्वर मस्तकको झाड़ा। फिर भगवान्के नाम लेकर श्रीकृष्णके श्रीकृष्णके उदरको दाम अर्थात् रस्सीसे बाँध दिया था; सब अङ्गोंका मार्जन किया। इसके बाद उस भयानक अतः सभी महापुरुषोंने उनका नाम दामोदर रख दिया। राक्षसीको गौओंके व्रजसे बाहर करके डरे हुए ग्वालोंकी वे दोनों यमलार्जुन वृक्ष भगवान्के पार्षद हो गये। सहायतासे उसका दाह किया। तय नन्द आदि वृद्ध गोप वहाँ बड़े-बड़े उत्पात होते एक दिन भगवान् श्रीहरि किसी छकड़ेके नीचे सोये जानकर दूसरे स्थानको चले गये। विशाल वृन्दावनमें हुए थे और दोनों पैर फेंक-फेंककर रो रहे थे। उनके यमुनाके मनोहर तटपर उन्होंने स्थान बनाया। वह प्रदेश पैरका धक्का लगनेसे छकड़ा ही उलट गया। उसपर जो गौओं और गोपियोंके लिये बड़ा ही रमणीय था। वर्तन-भाँड़े रखे हुए थे, वे सब टूट-फूट गये। गोप और महाबली राम और श्रीकृष्ण वहीं रहकर बढ़ने लगे। गोपियाँ इतने बड़े छकड़ेको सहसा उलटकर गिरा देख अब वे बछड़ोंके चरवाहोको साथ लेकर सदा बछड़े बड़े विस्मयमें पड़ी और 'यह क्या हो गया? ऐसा चराने लगे। बछड़ोंके बीचमें श्रीकृष्णको देखकर बक कहती हुई शङ्कित हो उठी। उस समय विस्मित हुई नामक महान् असुर वहाँ आया और वगलेका रूप यशोदाने शीघ्र ही अपने बालकको गोदमें उठा लिया। धारण कर उन्हें मारनेका उद्योग करने लगा। उसे देखकर वे दोनों यदुवंशी बालक माताके स्तनपानसे पुष्ट होकर भगवान् वासुदेवने भी खिलवाड़में ही एक देला उठा थोड़े ही समयमें बड़े हो गये और घुटनों तथा हाथोंके लिया और उसके पंखोंमें दे मारा । ढेला लगते ही वह बलसे चलने लगे। उन दिनों एक मायावी राक्षस मुर्गेका महान् असुर प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तदनन्तर रूप धारण किये वहाँ पृथ्वीपर विचरता रहता था। वह कुछ दिनोंके बाद एक दिन बछड़े चरानेवाले राम और श्रीकृष्णको मारनेकी ताकमें लगा था। भगवान् श्रीकृष्ण वनमें किसी यज्ञवृक्षकी छायामें पल्लव श्रीकृष्णने उसे पहचान लिया और एक ही तमाचेमें बिछाकर सो गये। इसी बीचमें ब्रह्माजी देवताओंके साथ उसका काम तमाम कर दिया। मार पड़नेपर वह पृथ्वीपर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये आये। किन्तु गिरा और मर गया। मरते समय उसने अपने उन्हें सोते देख बछड़ों और ग्वाल-बालोको चुराकर राक्षसस्वरूपको ही धारण किया था। स्वर्गलोकमें चले गये। जागनेपर जब उन्होंने बछड़ों और तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण समूचे व्रजमें विचरने ग्वाल-बालोंको नहीं देखा तो 'वे कहाँ चले गये?' लगे। वे गोपियोंके यहाँसे माखन चुरा लिया करते थे। इसका विचार किया; फिर यह जानकर कि यह सारी
SR No.034102
Book TitleSankshipta Padma Puran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages1001
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size73 MB
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