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________________ उत्तरखण्ड] • मग पुनिके द्वारा माघके पुण्यसे एक हाथीका द्वार . ...................................................... जो लोग धर्म बेचते हैं, वे हाथी ही होते हैं। विप्रवर ! भगवन् ! अत्यन्त घोर और अग्निके समान तेजस्वी इस समय आपने हाथीकी योनिसे भी मेरा उद्धार कर कालरूप मृत्यु तथा बहुत-से रोग आपके पास सेवामें दिया। मुझे स्वर्गकी प्राप्ति होनेके लिये आपने पुण्यदान उपस्थित रहते हैं। आपको नमस्कार है। किया है। मुनीश्वर ! मैं कृतार्थ हो गया, कृतार्थ हो गया, आप भयानक मारी और अत्यन्त भयङ्कर महामारीके कृतार्थ हो गया। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, साथ रहते हैं । पापिष्ठोंके लिये आपका ऐसा ही स्वरूप है। नमस्कार है। आपको बारम्बार नमस्कार है। __यों कहकर वह स्वर्गको चला गया। सच है, वास्तवमें तो आपका मुख खिले हुए कमलके सत्पुरुषोंका सङ्ग उत्तम गति प्रदान करनेवाला होता है। समान प्रसन्नतासे पूर्ण है। आपके नेत्रोंमें करुणा भरी है। इस प्रकार महानुभाव मृगशृङ्ग वैश्यको हाथीकी योनिसे आप पितृस्वरूप है। आपको नमस्कार है। आपके केश मुक्त करके स्वयं गलेतक पानीमें खड़े हो सूर्यनन्दन अत्यन्त कोमल हैं और नेत्र भौहोंकी रेखासे सुशोभित यमराजकी स्तुति करने लगे है। मुखके ऊपर मूंछे बड़ी सुन्दर जान पड़ती हैं। पके _ ॐ यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, हुए बिम्बफलके समान लाल ओठ आपकी शोभा बढ़ाते सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दन, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, हैं। आप दो भुजाओंसे युक्त, सुवर्णके समान कान्तिमान् चित्र और चित्रगुप्त-इन चौदह नामोंसे पुकारे जानेवाले और सदा प्रसत्र रहनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। भगवान् यमराजको नमस्कार है। आप सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित, रत्नमय जिनका मुख दाढ़ोंके कारण विकराल प्रतीत होता सिंहासनपर विराजमान, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण है और टेढ़ी भौहोंसे युक्त आँखें क्रूरतापूर्ण जान पड़ती हैं, करनेवाले तथा श्वेत छत्रसे सुशोभित हैं। आपके दोनों जिनके शरीरमें ऊपरकी ओर उठे हुए बड़े-बड़े रोम है ओर दो दिव्य नारियाँ खड़ी होकर हाथोंमें सुन्दर चैवर तथा ओठ भी बहुत लम्बे दिखायी देते हैं, ऐसे आप लिये डुला रही हैं। आपको नमस्कार है। यमराजको नमस्कार है। गलेके रत्नमय हारसे आप बड़े सुन्दर जान पड़ते आपके अनेक भुजाएँ हैं, अनन्त नख हैं तथा हैं। रत्नमय कुण्डल आपके कानोंकी शोभा बढ़ाते हैं। कलगिरिके समान काला शरीर और भयङ्कर रूप है। आपके हार और भुजवंद भी रत्नके ही है तथा आपके आपको नमस्कार है। किरीटमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए हैं। आपकी भगवन् ! आपका वेष बड़ा भयानक है। आप कृपादृष्टि सीमाका अतिक्रमण कर जाती है। आप पापियोंको भय देते, कालदण्डसे धमकाते और सब मित्रभावसे सबको देखते हैं। सब प्रकारकी सम्पत्तियाँ प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करते हैं। बहुत बड़ा भैंसा आपको समृद्धिशाली बनाती हैं। आप सौभाग्यके परम आपका वाहन है। आपके नेत्र दहकते हुए अंगारोंके आश्रय हैं तथा धर्म और अधर्मके ज्ञान में निपुण सभासद् समान जान पड़ते हैं। आप महान् है। मेरु पर्वतके आपकी उपासना करते हैं। आपको नमस्कार है। समान आपका विशाल रूप है। आप लाल माला और संयमनीपुरीकी सभामें शुभ्र रूपवाले धर्म, शुभवस्त्र धारण करते हैं। आपको नमस्कार है। लक्षण सत्य, चन्द्रमाके समान मनोहर रूपधारी शम, कल्पान्तके मेघोंकी भांति जिनकी गम्भीर गर्जना दूधके समान उज्ज्वल दम तथा वर्णाश्रमजनित विशुद्ध और प्रलयकालीन वायुके समान प्रचण्ड वेग है, जो आचार आपके पास मूर्तिमान् होकर सेवामें उपस्थित समुद्रको भी पी जाते, सम्पूर्ण जगत्को ग्रास बना लेते, रहते हैं; आपको नमस्कार है। पर्वतोंको भी चबा जाते और मुखसे आग उगलते हैं, उन आप साधुओंपर सदा नेह रखते, वाणीसे उनमें भगवान् यमराजको नमस्कार है। प्राणोंका सञ्चार करते, वचनोंसे सन्तोष देते और गुणोंसे
SR No.034102
Book TitleSankshipta Padma Puran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages1001
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size73 MB
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