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________________ विंशः सर्गः। 1379 ङ्गाजलमध्ये कुटिलकृष्णकेशकलापं निमज्ज्य स्नानं कुरु, ततश्च शुभ्रतरस्य गाङ्गजलस्य कृष्णतरकेशपाशसङ्गे प्रयागजलशोभा भविष्यतीति भावः / निदर्शनालङ्कारः॥१५८॥ शङ्खके समान ( स्वच्छ ) कान्तिवाला, लाया गया गङ्गाजल आपके ( काले एवं ) टेढ़े केशोंके संसर्गसे बाद में तरङ्गोंसे असमान ( गङ्गासे भिन्न अर्थात् कृष्णवर्ण, अथवा-उच्चावच 'निम्नोन्नत' ) यमुनाके मिलनेकी शोभाको चाहता है। [ आप घड़ोंमें लाये गये शुभ्र गङ्गाजलसे स्नान करें, जिससे आपके टेढ़े एवं कृष्णवर्ण केश-समूहके साथ मिलकर उस गङ्गाजलकी शोभा टेढ़े एवं कृष्णवर्ण तरङ्गोंवाली यमुनामें मिलने के समान हो ] // 158 // तपति जगत एव मूर्दिन भूत्वा रविरधुना त्वमिवाद्भुतप्रतापः / पुरमथनमुपास्य पश्य पुण्यरधरितमेनमनन्तरं त्वदीयैः / / 156 / / तपतीति / स्वम् इव भवानिव, अद्भुतप्रतापः आश्चर्यतेजःसम्पन्न :, एकत्रकोषदण्डजप्रभावशाली, अन्यत्र-मध्याह्नकालिकप्रखरकरसम्पन्न इत्यर्थः। रविः सूर्यः, अधुना इदानीम् , जगतः पृथिव्याः, मूनि एव शिरसि एव, आकाशस्य उपयवेति यावत् , भूत्वा स्थित्वा, तपति सन्तापं ददाति, एकत्र-दुर्जनान् शास्ति, अन्यत्र-जगन्ति सन्तापयतीत्यर्थः / तनन्तरं ततश्च स्नानोत्तरकालम् , पुरमथनं शिवम् , उपास्य अर्चयित्वा, त्वदीयैः पुण्यैः तव सेवासुकृतैः, इवेति शेषः / अधरितं मस्तकोपरिभागात् च्यावितम् , तदा मध्याह्नापगमात् अधस्तात् गतमित्यर्थः / एनं रविम , पश्य अवलोकय, प्रणामार्थमिति भावः। पुरहरप्रसादात् सूर्याभ्यधिकप्रतापो भविष्यसि इत्यर्थः // 159 // आपके समान आश्चर्यजनक प्रताप (क्षात्र तेज, पक्षा०-किरणोष्णता) वाला यह सूर्य संसारके ऊपर (सबके मस्तकपर, पक्षा०-सबसे ऊपर आकाशमें) होकर तप (दुष्टोका शासन, पक्षा०-संसारको सन्तप्तकर) रहा है, (आप) शङ्करजीकी उपासना कर के बादमें मानो आपके पुण्योंसे अधोभूत इस सूर्यको देखिये / [शिव पूजन करने के वाद सूर्यको नमस्कार करें और देखें कि इस समय यद्यपि यह सूर्य आपके समान ही प्रतापी है, किन्तु आपके शिव-पूजन करने के बाद मानो उस पूजनसे उत्पन्न आपके पुण्य के प्रभावसे यह सूर्य नीचा हो गया है। दोपहर के बाद स्वत एव पश्चिम दिशाकी ओर ढले हुर सूर्यको नलके शिवपूजनजन्य पुण्योंसे नीचा होने की गम्योत्प्रेक्षा की गयी है ] // 159 // आनन्दं हठमाहरन्निव हरध्यानार्चनादिक्षणस्यासत्तावपि भूपतिः प्रियतमाविच्छेदखेदालसः / पक्षद्वारदिशं प्रति प्रतिमुहुर्दाङ् निर्गतप्रेयसी प्रत्यावृत्तिधिया दिशन् दृशमसौ निर्गन्तुमुत्तस्थिवान् // 160 // आनन्दमिति / हरस्य शिवस्य, ध्यानार्चनादिक्षणस्य मनःसमाधानपूर्वकचिन्ता. पूजादिसमयस्य / आसत्तौ समीपवर्तित्वेऽपि, प्रियतमाविच्छेदखेदेन प्रेयसीवियोग. दुःखेन, अलसः जडः, कर्त्तव्यविमुख इत्यर्थः। असौ अयम् , भूपतिः राजा नलः
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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