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________________ 568 नैषधमहाकाव्यम् / सामान्य मानवी नहीं कह सकती', किन्तु सरस्वतीके अपने दिव्यरूप प्रकट करनेपर वीणापुस्तकादि चिह्नोंसे उसे पहचानकर दमयन्तीका आश्चर्य मन्द हो गया, क्योंकि उसने विचारा कि सरस्वती देवी के लिए ऐसे श्लेषादिपूर्ण वचनोंका कहना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है ] / / 66 // विलोकके नायकमेलकेऽस्मिन् रूपान्यथाकौतुक दर्शिभिस्तैः। बाधा बतेन्द्रादिभिरिन्द्रजाल विद्याविदां वृत्तिवधाद् व्यधायि / / 67 / / विलोकके इति / अस्मिन् पुरोवर्तिनि, नायकमेलके नृपतिसमूहे, विलोकके विलोकनकारिणि सति, रूपान्यथा रूपनानात्वं, सेव कौतुकं विनोदः, तद्दर्शिभिः तत्प्रदर्शकः, दृशेय॑न्तात्ताच्छील्ये णिनिः तैः इन्द्रादिभिः इन्द्रजालविद्याविदाम् ऐन्द्रजालिकानाम् , वृत्तिवधात् जीविकोच्छेदात् हेतोः, बाधा पीडा, व्यधायि विहिता, बतेति खेदे, एतन्महेन्द्रजालाद्भुतावलो किनां राज्ञाम् इन्द्रजालान्तरेषु अरुच्या स्वयंवरसभागतानां तदुपजीविनां तेषां वृत्तिविच्छेदः प्राप्त इत्यहो! सेयं देवमायेति भावः // 67 // इस राज-समूहके देखते रहनेपर स्वरूपके परिवर्तनरूप कौतुहलको दिखलानेवाले उन लोगों ( इन्द्रादि चार देव तथा सरस्वती देवी) ने ऐन्द्रजालिक विद्याके जानकारों अर्थात् जादूगरोंकी जीविकाकी हानि करनेसे बाधा की, यह खेद (या-आश्चर्य ) है। [ इन्द्रादिके स्वरूपपरिवर्तनको देखनेसे वहां उपस्थित राजा लोग वहां जीविकार्थ आये हुए ऐन्द्रजालिकोंका इन्द्रजाल देखनेके इच्छुक नहीं रह गये, अतएव उन ऐन्द्रजालिकोंकी जीविकामें इन्द्रादिने यह बाधा डाल दी। इन्द्रजाल देखने समान इन्द्रादिके स्वरूपपरिवर्तनको देखकर वहां उपस्थित राजा लोग आश्चर्यचकित हो गये ] // 67 // विलोक्य तावाप्तदुरापकामौ परस्परप्रेमरसाभिरामौ / अथ प्रभुः प्रीतमना बभाषे जाम्बनदोर्वीधरसार्वभौमः // 68 / / विलोक्योत / अथ साक्षात्कारानन्तरं, जाम्बूनदोर्वीधरस्य स्वर्णमयसुमेरुभूध. रस्य, सार्वभौमः सर्वस्याः भूमेरीश्वरः, सर्वाध्यक्ष इत्यर्थः, 'सर्वभूमिपृथिवीभ्याम. णी इत्यण-प्रत्ययः, 'अनुशतिकादीनाञ्च' इत्युभयपदवृद्धिः, प्रभुः महेन्द्रः आप्तदुः रापकामौ प्राप्तदुर्लभमनोरथी, परस्परप्रेम अन्योऽन्यानुरागः, स एव रसः तेन अभिरामौ, तो दमयन्तीनलौ, विलोक्य प्रीतमनाः सन्तुष्टचित्तः सन् , बभाषे // 6 // इसके बाद सुवर्णपर्वत अर्थात् सुमेरुके चक्रवर्ती ( अतएव ) सर्वसमर्थ एवं प्रसन्नचित्त ( इन्द्र ), दुर्लभ मनोरथको प्राप्त किये हुए ( अतएव ) पारस्परिक प्रेमरस ( स्तम्भ-स्वेदादि सात्त्विक भाव ) से सुन्दर उन दोनों ( दमयन्ती तथा नल ) को देखकर बोले-[ यहांपर इन्द्रके 'जाम्बूनदोवीधरसार्वभौम' और 'प्रभु' विशेषण वरदान देनेमें पूर्णरूपसे इन्द्रका 1. 'रूपान्यता-' इति पाठान्तरम् /
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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