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________________ 856 नैषधमहाकाव्यम् / काऽपि प्रमोदास्फुटनिर्जिहानवणैव या मङ्गलगीतिरासाम् / सैवाननेभ्यः पुरसुन्दरीणामुच्चैरुलूलुध्वनिरुच्चञ्चार / / 49 / / काऽपीति / प्रमोदेन हर्षातिरेकेण, अस्फुटं यथा तथा निर्जिहानाः निर्गच्छन्तः, वर्णाः यस्याः तादृशी एव हर्षपारवश्यात् अस्फुटाक्षरैवेत्यर्थः, आसां स्वयंवरदर्शनार्थ मागतानां, पुरसुन्दरीणाम् आननेभ्यः काऽपि अपूर्वा, या मङ्गलगीतिः, उच्चचार उच्चरिता, सैव अस्फुटाक्षरा मङ्गलगीतिरेव, उच्चैः तारम्, उलूलुध्वनिः, अभदिति शेषः / अनुकारिशब्दोऽयम् उलूलुरित्येवं रूपः कश्चित् हर्षणात्मको मुखोचार्यो ध्वनिविशेषः उत्सवादी स्त्रीभिरुच्चार्यते इत्युदीच्यानामाचारः। पुरसुन्दरीणां यत् उत्सवादी मङ्गलसूचकं गानं तदेव हर्षपारवश्यादस्फुटाक्षरत्वातं उलूलुध्वनिकल्पमभूदित्यर्थः॥ ___ अत्यधिक हर्षसे कहे जाते हुए अस्पष्ट अक्षरोंवाला जो ( स्वयम्वर देखने के लिए आयी हुई ) नगरकी स्त्रियोंके मुखसे मङ्गल-गान निकला अर्थात् गाया गया, वही 'उलू लु' ध्वनि (विवाहादि मङ्गल कार्योंके अवसर पर स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला 'उलू लु' रूप अस्पष्ट ध्वनि-विशेष ) उल्लसित हुआ / [ अब भी वङ्गदेशकी स्त्रियोंको मङ्गल-कार्योंमें 'उलूलु..." रूप अस्पष्ट शब्दोच्चारण करते देखा जाता है ] // 47 // रोमाणि सर्वाण्यपि बालभावाद् वरश्रियं वीक्षितुमुत्सुकानि | तस्यास्तदा कण्टकिताङ्गयष्टेरुद्ग्रीविकादानमिवान्वभूवन् / / 50 / / अथास्यास्त्रिभिः पुलकोदयमाह, रोमाणीत्यादि / तदा तत्काले, कण्टकिताङ्गयष्टेः पुलकितशरीरायाः, तस्याः भैम्याः, सर्वाण्यपि रोमाणि बालभावात् कचत्वात , शिशुत्वाच्च, 'बालः कचे शिशौ मूर्खे' इति विश्वः / वरस्य वोढुः नलस्य, श्रियं सौन्दर्य, वीक्षितुं द्रष्टम , उत्सुकानि सन्ति, उग्रीविका उन्नमितग्रीवीकरणं ग्रीवोन्नमन मिति यावत् / उग्रीवयतेः 'तत्करोति-' इति ण्यन्ताद्धात्वर्थनिर्देशेऽपि ण्वुल्प्रत्ययः तस्याः आदानं स्वीकारम्, अन्वभूवनिवेत्युत्प्रेक्षा। बाला ह्यद्ग्रीवा भृशं पश्यन्तीति भावः // ___ उस समय रोमाञ्चित शरीरयष्टिवाली उस ( दमयन्ती ) के, बालभाव ( केशत्व, पक्षा०-बचपन ) के कारण वर ( दुल्हा नल ) की शोभाको देखने के लिए उत्कण्ठित सभी रीम ऊपर की ओर गर्दन किये हुएके समान हो गये। [दमयन्तीके रोमाञ्चयुक्त शरीरमें खड़े हुए रोम ( रोंगटे ) ऐसे मालूम पड़ते थे कि मानो वे बचपन होनेसे वरकी शोभा देखने के लिए उत्सुक होकर ऊपर गर्दन किये हों। बच्चोंका दुल्हेको शोभा देखने के लिए उत्कण्ठित होना तथा छोटा होने के कारण अच्छी तरह नहीं दीखने से गर्दनको ऊपर उठाना स्वभाव होता है / प्रकृतमें 'ब' और 'व' में अभेद मानकर 'बालत्व' (बचपन ) तथा वालत्व' ( केशभाव ) होनेसे उक्त कल्पना की गयी है ] // 50 // रोमाङ्करैर्दन्तुरिताखिलाङ्गी रम्याघरा सा सुतरां विरेजे। शरव्यदण्डैः नितमण्डनश्री स्मारी शरोपासनवेदिकेव / / 51 //
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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