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________________ सप्तमः सर्गः। तहित चन्द्रमा दमयन्तीका मुख होकर यहां राहुसे भय नहीं होनेसे मुखपूर्वक निवास करता है / बालकोंका क्रीडा करना स्वाभाविक होनेसे चन्द्रमाके बाल अर्थात् उदयकालीन किरण-समूह मी दमयन्तीके अधरविम्बकी क्रीडा कर रहे हैं / दमयन्तीका मुखचन्द्रके तथा अधरोष्ठ सायंकालीन चन्द्रबिम्बके समान है ] // 52 // अस्या मुखस्यास्तु न पूर्णिमास्यं पूर्णस्य जित्वा महिमा हिमांशुम् | भ्रलचमखण्डं दधदमिन्दुर्भालस्कृतीयः खलु यम्य मागः // 53 // ___ अस्या इति / पूर्णिमायाः पौर्णमास्या आस्यं मुखीभूतं हिमांशुं जिस्वा पूर्णस्य समग्रस्य सतः अस्या भैम्या मुखस्य महतो भावो महिमा महत्त्वं नास्तु न स्यात् / काकुः / स्यादेव जेतुमहिमेत्यर्थः / किं च यस्य मुखस्य तृतीयो भागः तृतीयांशभूतः, भालो ललाटं भूरेव लचमखण्डः लान्छनैकदेशस्तं दधत् दधानः अर्धमिन्दुरर्धेन्दुः खलु / युक्तमर्धचन्द्रात्पूर्णचन्द्रस्य महावमिति भावः। अत्र मुखस्य पूर्णेन्दुत्वं भालस्यार्धचन्द्रत्वं च क्रमारपूर्णिमास्यं हिमांशुं भ्रलक्ष्मखण्डमिति च रूपकाभ्यामनुप्राणितमुत्प्रेच्यत इति रूपकसङ्कीर्णयोरुस्प्रेक्षयोः परस्परमुपकार्योपकारकमावा. दङ्गानिभावेन सङ्करः // 53 // पूर्णिमाके मुखरूप (पूर्णिमा-सम्बन्धी ) चन्द्रमाको जीत कर इस दमयन्तीके पूर्ण (सम्पूर्ण, पक्षा०-गोलाकार ) मुखकी महिमा नहीं होगी ? अर्थात् अवश्य होगी। भ्रूरूपी (चन्द्रमाके ) लाञ्छनके खण्डको धारण करता हुआ, जिस मुखका तृतीयांश (तीसरा भाग) ललाट आधा चन्द्रमा होता है। [ दमयन्तीका ललाट उसके मुख का तृतीया भाग (एक तिहाई हिस्सा) है और वह आधे चन्द्रमाके बराबर होनेसे अधिक है; चन्द्रमामें जो लान्छन है वह बहुत बड़ा है किन्तु दमयन्ती-मुखमें चन्द्र-लाञ्छनका एक टुकड़ा अर्थात् थोड़ा-सा हिस्सा है, अतः अधिक गुणयुक्त होनेसे दमयन्तीका पूर्ण मुख पूर्णिमाके सम्पूर्ण चन्द्रमाको जीतकर अवश्य महिमा पानेके योग्य है जिसका तृतीयांश आधेके वरावर है तथा कलङ्ग भी कम हैं, उसकी महिमा होना उचित ही है ] // 53 // व्यधत्त धाता मुखपद्ममस्याः सम्राजमम्भोजकुलेऽखिलेऽपि / सरोजराजो सृजतोऽदसीयां नेत्राभिधेयावत एव सेवाम् / / 54 // व्यधत्तेति / धाता अस्या मुखमेव पनम् / 'वा पंसि पद्मम्' इति पुंलिङ्गता। सम्राजमिति विशेषणात् / अखिलेऽप्यम्भोजकुले पनजाते विषये सम्राजं राजराजं व्यधत्त / अत एव राजराजत्वादेव नेत्राभिधेयौ नेत्रशब्दवाच्यौ सरोजानां राजानी सरोजराजो अमुष्य मुखपद्मस्य सम्बन्धिनीमदसीयां सेवां सृजतः कुरुतः। 'येनेष्टं 1. "पूर्णमास्यं" इति “पौर्णमास्यं" इति च पाठान्तरे / 2. “वदनाब्जमस्याः " इति पाठान्तरम् /
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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