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________________ 150 नैषधमहाकाव्यम् / एवं नलगुणाननुवयं गूढाभिसन्धिनाऽऽत्मनस्तदन्तः पुरेऽपि परिचयं दशयतिअवारितेत्यादि / तिरश्चां पक्षिणामवारितद्वारतया अप्रतिषिद्धप्रवेशतयेत्यर्थः / तस्य राज्ञो नलस्यान्तःपुरे निविश्य अवस्थाय परमाणुमध्यास्तदङ्गनाः रम्येषु गतेषु अधिकमपूर्व विशेषं भेदमध्यापयामः अभ्यासयामः / दुहादित्वाद् द्विकर्मत्वम् // 41 // तिर्यञ्चों ( पक्षी आदि ) को भीतर जानेके लिए द्वारपर रुकावट नहीं होनेसे उस राजा नलके रनिवासमें प्रवेशकर हमलोग परमाणुके बराबर अर्थात् अतिकृश कटिवाली रानियों को सुन्दर गतियोंमें अधिक विशेषता सिखलाते हैं। [नलकी अतिशय कृश कटिवाली इंसगामिनी रानियोंकी गति पहले ही रमणीय है, किन्तु उसमें भी अधिक रमणीयता हम लोग उन्हें सिखलाते हैं, क्योंकि तिर्यश्च होनेके कारण हम पक्षियोंको अन्तःपुर में प्रवेश करने में कोई रुकावट नहीं होती / बहुवचन कहनेसे हंसने अनेक इंसों को नलकी सेवामें लगे रहनेका संकेतकर दमयन्तीको नलके प्रति विशेष आकृष्ट करता है ] // 41 // पीयूषधारानधराभिरन्तस्तासां रसोदन्वति मजयामः / रम्भादिसौभाग्यरहःकथाभिः काव्येन काव्यं सृजताऽऽहताभिः ||4|| पीयूषेति / किं च पीयूषधाराभ्यः अनधराभिरन्यूनाभिरमृतसमानाभिः काव्यं पजता स्वयं प्रबन्धकळ, कवेरपत्यं पुमान् काव्यस्तेन, 'शुक्रो दैन्यगुरुः काव्य' इत्यमरः। 'कुर्वादिभ्यो ण्य' इति ण्यप्रत्ययः / आहताभिस्तस्यापि विस्मयकरीभिरित्यर्थः / रम्भादीनां दिव्यस्त्रीणां सौभाग्यं पतिवाबभ्यं तत्प्रयुक्ताभिः रहाकथाभीरहस्यवृत्तान्तवर्णनाभिस्तासां नलान्तःपुरतीणामन्तरन्तःकरणं रसोदन्वति शृङ्गाररससागरे मजयामः अवगाहयामः॥४२॥ हम लोग काव्यरचना करनेवाले शुक्राचार्यसे आदृत तथा अमृत-प्रवाहतुल्य रम्भादि अप्सराओंके (पुरुष-वशीकरणरूप ) सौभाग्य-सम्बन्धिनी रहस्यमयी कथाओंसे उन ( नल की रानियों ) के अन्तःकरणको शृङ्गार-रसरूप समुद्रमें निमग्न करते हैं // 42 // कामिने तत्राभिनवस्मराज्ञाविश्वासनिक्षेपवणिकक्रियेऽहम् / जिति यन्नव कुतोऽपि तिर्यकश्चित्तिरश्चनपते न तेन / / 43 / / काभिरिति / किायद्यस्मात् तिर्यक पक्षी कुत्तोऽपि जनान्न जिह्वेति न लजत एव ही-लज्जायामिति धातोर्लट, 'श्लाविति द्विर्भाधः / तिरश्चोऽपि कश्चिजनो न पते न लजते, तेन कारणेन तम्रान्तःपुरे काभिस्त्रीभिरहमभिनवा अपूर्वा स्मराज्ञा रतिरहस्यवृत्तान्तः सैव विश्वासनिक्षेपो विश्वासेन गोप्यार्थः / तस्य वणिक गोप्ता न किये न कृतोऽस्मि ? / सर्वासामप्यहमेव वित्रम्भकथापात्रमस्मीत्यर्थः // 43 // ___ वहाँपर ( नलके अन्तःपुरमें ) कौन सुन्दरियाँ अभिनव अर्थात् मुझे अतिगोपनीय कामाशाके विश्वासपूर्वक धरोहर रखनेका बनियाँ (व्यापारी) नहीं बनाती हैं अर्थात् उस नलके अन्तःपुरको कौन सुन्दरियाँ अपने गुप्ततम कामरहस्यको मुझसे नहीं कहती हैं।
SR No.032781
Book TitleNaishadh Mahakavyam Purvarddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1976
Total Pages770
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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