________________ ( 7 ) कथाएँ बनाकर उनके गच्छों को बदलने की कोशिश जरूर करी हैं पर समाज पर उनका कुछ भी प्रभाव न पड़ा और उल्टे वे तिरस्कार के पात्र समझे गए / उन आचार्यों की उदार वृत्ति का साक्षात्कार आज हजारों प्राचीन शिलालेख करा रहे हैं कि उन्होंने अपने उपासकों के मन्दिर मूर्तिएं की प्रतिष्टाएँ करवा कर अपने हाथों से उनको उपकेश वंशी लिखा है / फिर भी उन सब का उल्लेख मैं इस छोटे से निबंध में नहीं कर सकता। तथापि नमूना के तौर पर उन्हीं शिलालेखों से फेवल वे ही वाक्य उद्धृत करूँगा कि जिन जातियों के आदि में उपकेशवंश का प्रयोग हुआ है। प्राचीन जैन शिलालेख संग्रह भाग दूसरा संग्रहकर्ता-मुनि जिनविजयजी ( मूर्तियों पर के शिलालेख) लेखांक वंश गोत्र और जातियों वंश गोत्र और जातियों 185 | 260 384 उपकेश वंसे गणधर गोत्रे / 259 | उपकेशवंसे दरडागोत्रे उपकेश ज्ञाति काकरेच गोत्रे | उपकेशवंसे प्रामेचागोत्रे उपकेश वंसे कहाड गोत्रे 289 उ० गुलेच्छा गोत्रे 415 उपकेश ज्ञाति गदइया गोत्रे | 388 उ. चुन्दलिया गोत्रे 398 उपकेश ज्ञाति श्रीमालचंडा- ! 39. उ० भोगर गोत्रे ___लिया गोत्रे 366 / उ० रायभंडारी गोत्रे 413 उपकेश ज्ञाति लोढ़ा गोत्रे | 295 उकेशवंसिय वृद्धसजनिय * प्रस्तुत पुस्तक के शिलालेखों के मात्र नंबर अंक ही यही उदधत किये हैं।