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________________ ११४ महावीर की साधना का रहस्य हैं जिनका ज्ञान बहुत कम विकसित है । ऐसे मनुष्य भी हैं जिनका ज्ञान बहुत कम विकसित है । वे बहुत सारी सच्चाइयों को नहीं जानते और नहीं मानते । उनके नहीं जानने और नहीं मानने से हानि या लाभ का प्रश्न नहीं होता । कारण कि अस्तित्व उनसे परे है । एक फीते (Reel) पर अनेक चित्र अंकित हैं। अब कोई कहे कि मैं उसमें चित्र नहीं देखता इसलिए नहीं मानूंगा कि उसमें चित्र हैं । उसके न मानने से क्या अन्तर पड़ेगा ? क्या फीते में जो चित्र हैं वे नहीं होंगे ? क्या उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा नहीं होगा । जो है, जो प्रकट होने वाला है उसे हम कैसे अस्वीकार करें ? सिरे से शुरू नहीं होती । उसका आरम्भ नया नहीं होता । में सबसे बड़ी कठिनाई यही आती है कि उसका प्रारम्भ बहुत जटिल हो जाता यह कैसे हुआ ? यदि हम है | यह नया सिलसिला हमने शुरू क्यों किया ? नया सिलसिला शुरू करते हैं तो उसका कोई हेतु समझ में नहीं आता और यदि यह सिलसिला चालू है तो फिर चालू सिलसिले में कोई नया हेतु नहीं होता । यह ऐसा चलता आ रहा है और हम शरीर से सर्वथा मुक्त नहीं होंगे तब तक यह चलता रहेगा । उसका कोई आदि-बिन्दु नहीं है । शरीर के द्वारा ही शरीर का निर्माण होता है । शुद्ध चेतना कभी शरीर का निर्माण नहीं करती । वह मन और वाणी का निर्माण नहीं करती । द्वारा होता है । हमारा कर्म शरीर कार्य शरीर को उत्पन्न करता है । सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर को उत्पन्न करता है । हमारी दुनिया में जितना स्थूल है वह सारा सूक्ष्म के द्वारा निर्मित है । स्थूल को देखने का माध्यम सूक्ष्म को नहीं देखता । उसे देखने के लिए माध्यम को भी सूक्ष्म करना होता है । फिर वहां समझाने की बात नहीं होती, स्वयं की समझ सत्य से जुड़ जाती है । • इसका मतलब यह हुआ कि सूक्ष्म के साथ परम्परागत यह सारा शरीर के मन भी चलता ? मन नहीं चलता । चेतना और सूक्ष्म शरीर साथ-साथ शरीर में जो संस्कार शेष रह जाते हैं उनकी स्मृति मन के हो सकती है । • उन संस्कारों का निवास सूक्ष्म शरीर में कहां होता है ? हमारी स्मृति नये उसको न मानने चलते हैं । सूक्ष्म माध्यम से फिर जैसे हमारे स्थूल शरीर में वृत्ति केन्द्र हैं, वैसे ही सूक्ष्म शरीर में भी संस्कारों के केन्द्र हैं । उन केन्द्रों में संस्कार संचित रहते हैं ।
SR No.032716
Book TitleMahavir Ki Sadhna ka Rahasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMahapragya Acharya, Dulahrajmuni
PublisherTulsi Adhyatma Nidam Prakashan
Publication Year1985
Total Pages322
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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