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________________ सूत्रकृताङ्गेभाषानुवादसहिते षष्ठमध्ययने गाथा ३ श्रीवीरस्तुत्यधिकारः 'जानीषे' सम्यगवगच्छसि ‘णम्' इति वाक्यालङ्कारे तदेतत्सर्वं यथाश्रुतं त्वया श्रुत्वा च यथा 'निशान्त' मित्यवधारित यथा दृष्टं तथा सर्वं 'ब्रूहि' आचक्ष्वेति ॥२।। टीकार्थ - भगवान् महावीर स्वामी ने किस प्रकार ज्ञान प्राप्त किया था ? अथवा भगवान् का ज्ञान यानी विशेष अर्थ को प्रकाशित करनेवाला बोध कैसा था ? तथा सामान्य अर्थ का निश्चय करनेवाला उ था ? तथा यम, नियम रूप उनका शील कैसा था ? ज्ञात यानी क्षत्रिय के पुत्र भगवान् महावीर स्वामी के ये सब कैसे थे ?। हे सुधर्मास्वामिन् ! मैने जो पूछा है सो सब तुम अच्छी तरह जानते हो, 'णं' शब्द वाक्यालङ्कार में आया है, इसलिए जैसा तुमने सुना है और सुनकर जो निश्चय किया है तथा जैसा देखा है सो सब मुझको बताइए ॥२॥ - स एवं पृष्टः सुधर्मस्वामी श्रीमन्महावीरवर्धमानस्वामिगुणान् कथयितुमाह - इस प्रकार प्रश्न किये हुए श्रीसुधर्मास्वामी श्रीमन्महावीरस्वामी के गुणों को कहना आरम्भ करते हैखेयन्नए से कुसलासुपुन्ने (ले महेसी), अणंतनाणी य अणंतदंसी। जसंसिणो चक्खुपहे ठियस्स, जाणाहि धम्मं च धिई च पेहि ||३|| छाया - खेदज्ञः स कुशल आशुपज्ञ, अनन्तहानी चानन्तदशी । यशस्विनचक्षुपथे स्थितस्य, जानासि धर्म च चर्ति च प्रेक्षस्व ॥ अन्वयार्थ - (से खेयन्नए) भगवान् महावीरस्वामी, संसार के प्राणियों का दुःख जानते थे (कुसलासुपन्ने) वह आठ प्रकार के कर्मों का छेदन करनेवाले और आशुप्रज्ञ अर्थात् सदा सर्वत्र उपयोग रखनेवाले थे (अर्थतनाणी य अणंतदंसी) वे अनन्तज्ञानी और अनन्तदर्शी थे (जसंसिणो) कीर्तिवाले तथा (चक्खुपहे ठियस्स) जगत् के लोचनमार्ग में स्थित भगवान् के (धम्म) धर्म-स्वभाव को या श्रुतचारित्र धर्म को (जाणाहि) तुम जानो (घिई च पेहि) और उनकी धीरता को विचारो ? भावार्थ - श्रीसुधर्मास्वामी जम्बूस्वामी आदि शिष्यवर्ग से कहते हैं कि- भगवान् महावीर स्वामी संसार के प्राणियों का दुःख जानते थे, वे आठ प्रकार के कर्मों का नाश करनेवाले और सदा सर्वत्र उपयोग रखनेवाले थे, वे अनन्तज्ञानी और अनन्तदर्शी थे, ऐसे यशस्वी तथा भवस्थकेवली अवस्था में जगत् के लोचन मार्ग में स्थित उन भगवान् के धर्म को तुम जानो और धीरता को विचारो । - टीका - सः भगवान् चतुस्त्रिंशदतिशयसमेतः खेदं-संसारान्तर्वर्तिनां प्राणिनां कर्मविपाकजं दुःखं जानातीति खेदज्ञो दुःखापनोदनसमर्थोपदेशदानात्, यदिवा 'क्षेत्रज्ञो' यथावस्थितात्मस्वरूपपरिज्ञानादात्मज्ञ इति, अथवा-क्षेत्रम्आकाशं तज्जानातीति क्षेत्रज्ञो लोकालोकस्वरूपपरिज्ञातेत्यर्थः, तथा भावकुशान्-अष्टविधकर्मरूपान् लुनाति-छिनत्तीति कुशलः प्राणिनां कर्मोच्छित्तये निपुण इत्यर्थः, आशु-शीघ्रं प्रज्ञा यस्यासावाशुप्रज्ञः, सर्वत्र सदोपयोगाद्, न छमस्थ इव विचिन्त्य जानातीति भावः, महर्षिरिती क्वचित्पाठः, महांश्चासावृषिश्च महर्षिः अत्यन्तोग्रतपश्चरणानुष्ठायित्वादतुलपरीषहोपसर्गसहनाच्चेति, तथा अनन्तम्- अविनाश्यनन्तपदार्थपरिच्छेदकं वा ज्ञान- विशेषग्राहकं यस्यासावनन्तज्ञानी, एवं सामान्यार्थपरिच्छेदकत्वेनानन्तदर्शी, तदेवम्भूतस्य भगवतो यशो नृसुरासुरातिशाय्यतुलं विद्यते यस्य स यशस्वी तस्य, लोकस्य 'चक्षुःपथे' लोचनमार्गे भवस्थकेवल्यवस्थायां स्थितस्य, लोकानां सूक्ष्मव्यवहितपदार्थाविर्भावनेन चक्षुर्भूतस्य वा 'जानीहि' अवगच्छ 'धर्म' संसारोद्धरणस्वभावं, तत्प्रणीतं वा श्रुतचारित्राख्यं, तथा तस्यैव भगवतस्तथोपसर्गितस्यापि निष्प्रकम्पां चारित्राचलनस्वभावां 'धृति संयमे रतिं तत्प्रणीतां वा 'प्रेक्षस्व' सम्यक्कुशाग्रीयया बुद्धया पर्यालोचयेति, यदिवा- तैरेव श्रमणादिभिः सुधर्मस्वाम्यभिहितो यथा त्वं तस्य भगवतो यशस्विनश्चक्षुष्पथे व्यवस्थितस्य धर्म धृति च जानीषे ततोऽस्माकं 'पेहित्ति कथयेति ॥३॥ टीकार्थ - चौंतीस अतिशयों के धारक वे भगवान् महावीर स्वामी संसार में रहनेवाले प्राणियों के कर्म का ३४१
SR No.032700
Book TitleSutrakritanga Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherRamchandra Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages364
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size17 MB
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