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साधनामें गिर गये तो क्या होगा? ऐसे सोच कर साधना शुरु करना बंध कर दें तो कैसे चलेगा ?
चंडकौशिक जैसे को भी भगवान तारने आते हों तो हमें तारने नहीं आयेंगे ?.
भगवान हम को सदा तारने की इच्छा रखते ही हैं, किंतु कठिनाई यही हैं : हम ही तैरना नहीं चाहते हैं । हम ही निःशंक बनकर भगवान को नहीं पकड़ रहे हैं ।
__ प्रत्युत, हम हमारे तारनेवाले को हमारी ओर खींचने का प्रयत्न कर रहे हैं । अग्निमें या कुंएमें पड़ा हुआ आदमी स्वयं को खींचनेवाले को मदद तो न करे, पर प्रत्युत स्वयं के बचानेवाले को खींचने का प्रयत्न करता हो तो क्या समझना?
(पू. हेमचंद्रसागरसूरिजी पधारे ।) मुनि भाग्येशविजयजी : समाप्त कराने आये ।
पूज्यश्री : समाप्त कराने नहीं, सार सुनने के लिए आये हैं। पू.पं. भद्रंकर वि.म. के पास ऐसा बहुत सीखने मिला हैं । किसी घटनामें से वे अच्छा ही ग्रहण करते ।
टेढी-टेढी लकीरें करते बालक को उपालंभ देने की जगह एक (१) लिखकर बताओ तो काम हो जायेगा । वह सीख जायेगा । वह जितना करे उसकी अनुमोदना करो ।
किसीने संपूर्ण आलोचना न ली हो तो विचारें : इतनी तो ली ! जितनी ली उतनी तो शुद्धि होगी ! परंतु उसके उपर गुस्सा न करें । उसे अन्य दृष्टांतों के द्वारा संपूर्ण आलोचना लेने के लिए प्रेरित करें ।
(२९) बुद्धाणं बोहयाणं ।
संपूर्ण जगत अज्ञान-निद्रामें सोया हो तब भगवान उसे झकझोरते हैं, जगाते हैं । स्वयं जागृत हुआ आदमी स्वाभाविक रूप से ही दूसरे को जागृत करने का प्रयत्न करेगा । भगवान स्वयं जाग गये हैं । और दूसरे को भी जगानेवाले हैं।
भगवान तो हमारे माता-पिता, बंधु, नेता आदि सब कुछ हैं। वे नहीं जगायें तो कौन जगायेगा ?
लेकिन हम भगवान को पराये मानते हैं । इसलिए ही फुरसत (२७६ mmmmmmmmmssss wo कहे कलापूर्णसूरि - ४)