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________________ बांकी (कच्छ) चातुर्मास प्रवेश, वि 'श्री पंचवस्तुक ग्रन्थ प्रारम्भ' १८-७-१९९९, रविवार आषा. सु. ६ हरिभद्रसूरिजी के ग्रन्थ हमारे लिए दीपक हैं । घोर कलियुग अर्थात् भयानक अन्धकार । अन्धकार के अनुभव के बिना दीपक की महिमा समझ में नहीं आती । ग्रन्थ के द्वारा ग्रन्थ-प्रणेता का परिचय प्राप्त होता है । इतनी छोटी सी जिन्दगी में ऐसे ग्रन्थों की रचना कैसे की होगी ? विहार करना, संघ के कार्य करना, शासन के कार्य करना, स्वयं अध्ययन करना, शिष्यो आदि को अध्यापन कराना - यह सब वे किस प्रकार कर सके होंगे ? उनकी कितनी अप्रमत्त दशा होगी ? यह सोचते-सोचते हृदय गद्-गद् हो जाता हैं । . जो आये उन्हें प्रवेश देने का कार्य पांजरापोल को अनुकूल है, हमें अनुकूल नहीं लगता । अतः दीक्षार्थी के गुणों का अवलोकन एवं परीक्षण आवश्यक हैं । गुरु कैसे होने चाहिये ? आदि बातों का वर्णन भी इस पंचवस्तुक ग्रन्थ में आयेगा । * महापुरुषों के समीप रहने का बड़ा लाभ यही है कि (कहे कलापूर्णसूरि - १ *** १ ****************************** ४५
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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