SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 73
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 'कहे कलापूर्णसूरि-३' (गुजराती) पुस्तक का विमोचन, डीसा, वि.सं. २०५७ ११-७-१९९९, शनिवार आषा. व. १३ + उपा. यशोविजयजी को 'लघु हरिभद्र' कहा गया है । उन्हों ने वर्तमानकाल के समस्त ग्रन्थों का अवलोकन किया था । इतना ही नहीं, वे उनके रहस्य तक भी पहुंचे थे । आज लगभग ३५० वर्षो के बाद भी हम उन महापुरुषों को उनके ग्रन्थों के माध्यम से मिल सकते हैं । साक्षात् महापुरुषों से भी मिलना हो जाये तो भी वे हमें कहें या न कहें, यह प्रश्न है, परन्तु ग्रन्थ अवश्य कहते हैं, 'यदि हमारे पास कान हों तो , 'जिन ही पाया, तिन ही छिपाया' इस प्रकार महापुरुष कुछ कहते नहीं हैं, परन्तु ग्रन्थ में अनायास ही कह दिया जाता है । ✿ किसी भी मार्ग से सिद्धाचल जायें, परन्तु दादा के दरबार में सभी एक । किसी भी योग ( भक्ति, ज्ञान, कर्म या किसी अन्य) से साधना करें, आत्मानुभव के दरबार में सभी एक ! 'विभिन्ना अपि पन्थानः समुद्रं सरितामिव । मध्यस्थानां परंब्रह्म, प्राप्नुवन्त्येकमक्षयम् ॥' ज्ञानसार, मध्यस्थताष्टक अन्य दर्शनी भी जो केवलज्ञान प्राप्त कर लेते हैं वे इस कारण कहे कलापूर्णसूरि १ ****************************** २१ -
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy