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________________ यह बात मेरे मन में बेठ गई । मैंने अखबार पढना शुरू किया, लेकिन मेरा मन अनेक विचारों से घिर कर विक्षिप्त होने लगा । अखबार अर्थात् समस्त संसार का कचरा । मुझे विचार आया कि इसमें मेरा काम नहीं है । मैंने अखबार पढने बन्द कर दिये । लोगों को अच्छा लगे वह नहीं बोलना है। उन्हें तो भगवान की बात कहनी हैं । जीवन में भावित बना कर कहनी हैं, फिर उसका प्रभाव कोई और ही पड़ेगा ।। पूज्य प्रेमसूरिजी व्याख्यानकारों को कहते - 'अरे, तेरे व्याख्यान में आगम की तो कुछ भी बात नहीं आई ।' अहमदाबाद में मैंने दिन में दो बार व्याख्यान देना शुरू किया । किसी व्यक्ति ने कहा - 'दो बार व्याख्यान देना बंद करें । एक बार व्याख्यान पर्याप्त है । लोगों को कुछ प्राप्त होने वाला नहीं बोलने से ऊर्जा का अत्यन्त व्यय होता है । मौन से ऊर्जा की बचत होती है। यह बात कुछ उम्र होने पर समज़ में आती जामनगर में प्रथम बार अध्यात्मसार + कुमारपाल व्याख्यान में पढा । द्वितीय वर्षावास में वैराग्यकल्पलता । . जंबूविजयजी जैसे विद्वान भी नित्य २० माला गिनकर ही आहार-पानी ग्रहण करते हैं । भगवान की भक्ति भी कितनी प्रबल ? इसी कारण से उनका कथन प्रभावशाली बनता है । . गौतमस्वामी एक मरणासन्न श्रावक को मांगलिक श्रवण कराने के लिए गये थे । कुछ समय के बाद भगवान ने कहा, 'वह श्रावक मर कर पत्नी के कपाल में कीड़ा बना हैं, क्योंकि मृत्यु के समय उसका ध्यान वहीं था । जहां हमारा मन होगा, वहां जाना पडेगा । कितना अच्छा हो यदि मृत्यु के समय भी हमारा मन प्रभु में रहे ? . सामान्य जाति से प्रभु के साथ हम एक हैं, विशेष से भिन्न हैं। * मन के लिए तीन आलम्बन - १. अभिरूप (मनोहर) जिन-प्रतिमा । आपका मन प्रतिमा में स्थिर होना चाहिये ताकि (कहे कलापूर्णसूरि - १ ***** १ ****************************** १९
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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