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________________ प.पू. आचार्यश्री विजय देवेन्द्रसरिजी की ७-७-१९९९, बुधवार आषा. व. ९ ✿ भव के रागी को विषय कषाय के बिना चैन नहीं पड़ता, उस प्रकार भगवान के रागी को भगवान के बिना चैन नहीं पड़ता । यही प्रीतियोग है । जिसके प्रति प्रेम हुआ हो, उसको समर्पित होना ही पड़ता है, उसको वफादार रहना ही पड़ता है । यह भक्तियोग है । जिनको हम समर्पित होते हैं, उनकी बात स्वीकार करनी पड़ती है । 'स्वीकार करनी पड़ती हैं - यह कहने की अपेक्षा जहां प्रेम (समर्पण) होता है, वहां अनायास ही उनकी वात स्वीकार कर ली जाती है । यही वचन - योग है । जिनकी वात स्वीकार कर ली उनके साथ एकात्म भी होना ही पड़ेगा । यह असंगयोग है । ✿ कोई भी योग (स्थान आदि अथवा अहिंसा आदि) उस समय सिद्ध हुआ माना जाता है जब आपके द्वारा अनायास ही अन्य में विनियोग हो सके । ✿ नमस्कार करने की मुझमें शक्ति नहीं है, योग्यता भी नहीं है । इसी लिए 'शक्रस्तव' में 'नमामि' न कहकर 'नुमुत्थुणं' ( नमोस्तु) कहा गया । 'नमोस्तु' अर्थात् 'नमस्कार हो ।' मैं नमता ( कहे कलापूर्णसूरि- १ *** ******** 9
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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