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________________ उत्तर : करेमिभंते में ही क्या सामायिक की प्रतिज्ञा नहीं ली ? सामायिक तीन प्रकार के है : श्रुत (ज्ञानाचार), सम्यक्त्व ( दर्शनाचार) और चारित्र सामायिक ( चारित्राचार) · दशवैकालिक ं की रचना से पूर्व आचारांग के प्रथम अध्ययन के बाद ही बड़ी दीक्षा होती थी । ✿ चउविसत्थो से दर्शनाचार की वन्दन से दर्शनाचार एवं ज्ञानाचार की, प्रतिक्रमण से चारित्राचार की, काउस्सग्ग तथा पच्चक्खाण से तप- आचार की । प्रश्न : वीर्याचार कितने प्रकार का होता है ? उत्तर : छत्तीस प्रकार का । कौन से ३६ प्रकार ? ज्ञानाचार के ८, दर्शनाचार के ८, चारित्राचार के ८, तपाचार के १२ = ३६; इन सब में वीर्य प्रगट करना वीर्याचार | अतः वीर्याचार ३६ प्रकार का है । ३६ + ३६ = ७२; कुल पांचों आचारों के ७२ प्रकार होते हैं । 'कह्युं कलापूर्णसूरिए' पुस्तक मळ्युं. हजी तो हाथमां जलीधुं छे परंतु, ‘First Impression is last Impression...' प्रथम दृष्टिए ज प्रभाविक छे. ३८६ ****+ गणि राजयशविजय सोमवार पेठ, पुना. ****** कहे कलापूर्णसूरि
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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