SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 212
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ मित्र के प्रेम या शादी के प्रेम में भी ऐसा ही है । दूसरों का प्रेम छोड़ने पर ही प्रभु के साथ मिल सकते है । चौथे योग का केवल नाम असंग है, परन्तु सचमुच तो प्रभु का संग ही है । असंग तो केवल पुद्गल से करना है। 'प्रभु ! हमारे शत-शत पुन्य से अरूपी होने पर भी आप रूप धारण करके आये है' ये प्रेम के उद्गार हैं । अभी जिज्ञासु साधक मेजिस्ट्रेट आये थे। प्रकृति का नियम है कि जिसे जो चाहिये वह उसे प्राप्त करा देती है। यदि नहीं मिले तो साधना में कमी समझे । साधना के लिए कोई मार्गदर्शन न हो तो प्रभु स्वयं आकर मार्गदर्शक बनते है । उन्होंने कहा, 'मैं मुसलमान हूं । अपने धर्म के अनुसार मैं निरंजन-निराकार का ध्यान करता हूं, परन्तु पकड़ नहीं सकता हूं। मन कुछ समय में छटक कर चला जाता है । मैंने कहा : उपाय बताऊं ? ___ हम संसारी रूपी हैं । अरूपी निरंजन को भला हम कैसे पकड़ सकते हैं ? अतः हमें साकार-रूपी प्रभु को पकड़ कर प्रारम्भ करना चाहिये ।' उन्होंने यह बात स्वीकार कर ली । शंखेश्वर पार्श्वनाथ का चित्र भी स्वीकार कर लिया । 'अक्षयपद दिये प्रेम जे, प्रभु नुं ते अनुभव रूप रे, अक्षरस्वर गोचर नहीं, ए तो अकल अमाप अरूप रे.' यह असंग योग का वर्णन है । cod 'कडं कलापूर्णसूरिए' नुं बहुमूल्य नजराणुं हमणां ज हाथमां आव्यू. पूज्यश्रीनी आ वाचना-प्रसादी अनेक आत्माओने सुलभ करी आपवाना तमे आदरेला सम्यक् प्रयास बदल तमने खूब-खूब धन्यवाद... - आचार्य विजयरत्नसुंदरसूरि १६० ****************************** ********* कहे कलापूर्णसूरि - १) कह
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy