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________________ से सीधे दो हजार चले जाते हैं । ___ अजीव के साथ भी जयणापूर्वक व्यवहार करना है । पू. देवेन्द्रसूरिजी को हमने देखे हैं । संध्या होने पर पोथी आदि को लपेट कर जयणापूर्वक रख देते । साधु आहार आदि चार संज्ञा का विजेता होता है। संज्ञा के द्वारा संचालित पशु होते हैं, साधु तो संज्ञा पर नियन्त्रण रखते हैं । चार संज्ञा से दस को गुणा करने पर १० x ४ = ४० ४० x ५ इन्द्रिय = २०० २०० x १० यति धर्म = २००० (इसलिए मैंने दांडा का पडिलेहन न करने पर २००० चले जाते हैं यह कहा था) २००० x ३ योग = ६००० ६००० x ३ (करण, करावण, अनुमोदन) = १८ हजार । ये १८००० शीलांग हैं । अठारह हजार शीलांग के लिए अन्य भी अनेक रीतियां हैं । - आप दूसरे को अभयदान दो तो आप स्वयं निर्भय बनोगे ही । पालीताना में कुन्दकुन्द विजयजी ने कालग्रहण लेने के लिए हाथ में मोर पंख लेने पर छिपा हुआ साप भाग गया । आज्ञा के पीछे के ये रहस्य हैं । हम आहारी हैं, प्रभु अणाहारी हैं । तप करने पर हम प्रभु के साथ सम्बन्ध बांधते हैं । इसीलिए उपवास के दिन मन तुरन्त ही चिपकता हैं, क्योंकि चित्त निर्मल होता है । तप के साथ जप किया जाये तो सोने में सुगन्ध मिलती है । भक्ति * दूर स्थित भगवान को हृदय में धारण करने की कला भक्ति है । भगवान चाहे जितने समर्थ हों, परन्तु आखिर वे भक्ति के आधीन हैं । भगवान की अनन्त करुणा समस्त जीवों पर बह रही हैं । उन्होंने हमारे साथ सम्बन्ध विच्छेद नहीं किया । विच्छेद करें भी कहे कलापूर्णसूरि - 3 १४६ ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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