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________________ श्रावक-जीवन में ध्यान नहीं किया जाता है, यह बात नहीं है । परन्तु निश्चल ध्यान नहीं आता । ध्यान-अभ्यास अवश्य हो सकता है । संयम से ही निश्चल ध्यान आता है । निर्वात दीप जैसे ध्यान के लिए तो संयम ही चाहिये । अहिंसा से पर जीवों के साथ सम्बन्ध संयम से स्व के साथ सम्बन्ध सुधरता है । जीवों की हिंसा करके आप अपने ही भाव-प्राणों की हत्या करते हैं । करुणा, कोमलता, सम्यग्दर्शन के गुण हैं । उनका नाश होता है । जितने अंशों में अहिंसा होती है, उतने अंशो में निर्मलता आती ही है । दीक्षा अंगीकार करने से पूर्व मैंने पत्र से पूछा : - 'क्या मुझे ध्यान के लिए चार-पांच घंटे मिलेंगे ?' पू. कनकसूरिजी ने उत्तर दिया, 'तो तुम गुफा में चले जाओ ।' परोपकार स्वोपकार से अलग नहीं है । ये दोनों एक ही हैं । इसी कारण तीर्थंकर देशना देकर परोपकार करते रहते हैं । अहिंसा : सम्यग्दर्शन । संयम : सम्यग् ज्ञान । जीवाजीवे अयाणतो... कहं सो नाहीइ संजमं ? तप : सम्यक्चारित्र उपकरणों को जयणापूर्वक लेने-रखने की क्रिया 'अजीव संयम' है। सत्रह असंयमों को जीतने का नाम संयम है। पांच इन्द्रिय, चार कषाय, पांच अव्रत, तीन योग = १७. तीन योग गृहस्थ जीवन में धर्म-प्रवृत्ति करो तभी शुभ, अन्यथा नहीं । • अठारह हजार शीलांग स्मरण रखने सर्वथा सरल है। देखो - एकेन्द्रिय के पांच भेद । बेइं.-तेइं.-चउ.-पंचें. + अजीव = दस प्रकार से जयणा करनी । एक दांडा लेते समय जयणा न की तो अठारह हजार में कहे कलापूर्णसूरि - १ ******* - १******************************१४५
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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