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________________ . हिंसा से चित्त कलुषित होता है, अहिंसा से निर्मल होता है । हिंसा अर्थात् पर-पीडन । प्रमाद भी हिंसा है, विशेष कर के साधुओं के लिए । गृहस्थों के लिए आरम्भ । पर-पीडन अर्थात् हिंसा । पृथ्वी, पानी, वनस्पति आदि का भोग लेकर हम जीवित हैं और आवश्यकता पड़ने पर उसके लिए क्या कुछ नहीं करना ? मनुष्य का कर्तव्य है कि वह स्वयं से अशक्त की रक्षा करे । प्रणिधान का अर्थ है - स्वयं से हीन जीवों के प्रति करुणा के साथ भावार्द्र बनता मन । अधिक गुणवान के साथ प्रमोद । समस्त जीवों के साथ मैत्री । स्वजनों का सम्बन्ध आप छोड़ते नहीं है । भगवान कहते है - जगत् के समस्त जीव आपके स्वजन ही हैं। उनके साथ आप सम्बन्ध-विच्छेद कर नहीं सकते । आप यह नहीं कह सकते कि जीवों के साथ मेरा क्या लेना-देना ? आप अपने उत्तरदायित्व से हट सकते नहीं । यदि आप हटने का प्रयत्न करो तो आपको दुगुना दण्ड मिलेगा । जीव + अस्ति + काय = जीवास्तिकाय । अनन्त जीवों का + अनन्त प्रदेशों का + समूह = जीवास्तिकाय । इनमें से एक भी जीव अथवा एक जीव का एक प्रदेश भी शेष रह जाये तो 'जीवास्तिकाय' नहीं कहलायेगा । ऐसा भगवती सूत्र में भगवान ने कहा हैं । भगवान ने किसी को बाकी नहीं रखा । हमने सबको बाकी रखा, केवल अपनी आत्मा को छोड़ कर । जीव मात्र के प्रति स्नेहभाव - आत्मभाव- मैत्रीभाव रखे बिना ध्यान नहीं लग सकता । वह ध्यान नहीं, ध्यानाभास हो सकता है । समस्त जीवों के साथ आत्मवत् व्यवहार करना - 'आत्मवत् सर्व भूतेषु ।' । ऐसा जैनेतर भी कहते हैं । निर्मलता के बिना स्थिरता नहीं आती । स्थिरता के बिना तन्मयता नहीं आती । १४४ ****************************** कहे
SR No.032617
Book TitleKahe Kalapurnasuri Part 04 Hindi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMuktichandravijay, Munichandravijay
PublisherVanki Jain Tirth
Publication Year
Total Pages656
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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